अमेरिका के विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ने रामायण पढ़ने के लिए अंग्रेजी भाषा छोड़ी

अमेरिका के विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ने रामायण पढ़ने के लिए छोड दी अंग्रेजी
मई 5, 2016
#पाश्चत्य
संस्कृति के अंधानुकरण के कारण भले ही आज भारत में भगवान श्री राम और
#रामायण का महत्व कम समझ पा रहे हैं, लेकिन कई विदेशी बुद्धिजीवी लोगों ने
गीता, रामायण आदि ग्रन्थों का अध्ययन किया और आखिरी सार पर आये कि दुनिया
में सबसे श्रेष्ठ हिन्दू धर्म ही है और बाद में उन्होंने हिन्दू धर्म भी
अपना लिया ।
importance of Hindi
ऐसे
ही अमेरिका की विश्वविद्यालय ऑफ हवॉई के #प्राध्यापक #रामदास ने बताया कि
उन्होंने रामायण सीखने के लिए #अंग्रेजी का भी त्याग कर दिया ।
जबलपुर
: गुरु ने दो वर्ष तक अंग्रेजी न बोलने का संकल्प दिला दिया। फिर #हिंदी
बोलना सीखा। दो वर्ष तक लगातार अभ्यास किया और हिंदी सीख ली। अब भारत में
सभी से हिंदी में ही बात करता हूँ । यह बात चर्चा के दौरान अमेरिका की
विश्वविद्यालय ऑफ हवॉई में धर्म विभाग के प्राध्यापक रामदास ने कही।
उन्होंने
बताया कि मां काफी गरीब थी, जो दूसरों के घरों में सफाई करने जाया करती थी
। वहां से पुस्तकें ले आती थी। एक बार महात्मा गांधी की पुस्तक लेकर आईं,
जिसे पढ़कर भारत आने का मन हुआ। लोगों के सहयोग से 20 साल की उम्र में पहली
बार भारत आया। दूसरी बार 22 वर्ष की उम्र में भारत आया। उन्होंने बताया कि
इसके बाद चित्रकूट में मानस महाआरती त्यागी महाराज के सानिध्य में आया और
उनसे दीक्षा ले ली।
अमेरिका में रामलीला करती है #स्टार्नफील्ड की टीम
25
साल पहले विश्वविद्यालय में अचानक #महर्षि वाल्मीकि का चित्र दिखा, इसमें
उन्हें अपने पिता का चेहरा दिखार्इ दिया। उनके बारे में जानकारी एकत्रित
की और #वाल्मीकि रामायण पढा तभी से रामायण को विस्तृत जानने की प्रेरणा
निर्माण हुर्इ। यह बात विश्व रामायण परिषद में शामिल होने आए #महर्षि
विश्वविद्यालय ऑफ मैनेजमेंट पेयरफिल्ड, लोवा यूएसए के प्रोफसर #माइकल
स्टार्नफिल्ड ने कही। उन्होंने बताया कि उनकी 400 लोगों की एक टीम है,
जिसमें बच्चे, युवा व बुजुर्ग शामिल हैं, जो #वाल्मीकि रामायण पर आधारित
रामलीला करते हैं। उनकी ड्रेस #भारतीय रामलीला से मिलती जुलती है।
थाईलैंड की प्राथमिक शिक्षा में शामिल है #रामायण
बैंकाक
की #सिल्पाकॉर्न विश्वविद्यालय के एसोसिएटेड प्राध्यापक #बूंमरूग खाम-ए ने
बताया कि थाईलैंड में रामायण,लिटरेचर की तरह स्कूल और कॉलेजों के
पाठ्यक्रम में शामिल है। विश्वविद्यालय के खोन (नाट्य) विभाग के छात्र सबसे
अधिक #रामलीला को पसंद करते हैं। थाईलैंड में रामायण को #रामाकेन और
#रामाकृति बोलते हैं। जो वाल्मीकि रामायण से मिलती जुलती है, किंतु इसमें
थाई कल्चर का समावेश है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय के अनेक
विद्यार्थी #रामायण पर #पीएचडी कर रहे हैं। इसमें से कुछ वर्ल्ड रामायण
कांफ्रेंस में शामिल होने जबलपुर आए हैं।
थाईलैंड की रामायण में हनुमानजी ब्रह्मचारी नहीं
प्राध्यापक
बंमरूग खाम-ए ने बताया कि भारत की वाल्मीकि रामायण में हनुमान जी को
ब्रह्मचारी बताया गया है। जबकि थाईलैंड की रामायण (रामाकेन) में हनुमानजी
की पत्नी और पुत्र का उल्लेख है।
हम हिंदी प्रेमी हैं
थाईलैंड
से आईं चारिया #धर्माबून हिंदी प्रेमी हैं। पढ़ाई के दौरान राम के चरित्र
से प्रभावित होकर रामायण पर पीएचडी कर रही हैं। उन्होंने अपने इस प्रेम को
टीशर्ट पर ‘हम हिंदी प्रेमी हैं’ के रूप में भी लिख रखा है। वर्ल्ड रामायण
कांफ्रेंस में शामिल होने उनके साथ #सुपापोर्न पलाइलेक, #चोनलाफाट्सोर्न
बिनिब्राहिम और #पिबुल नकवानीच आए हैं। सभी #शिल्पाकर्न विश्वविद्यालय से
#रामायण में #पीएचडी कर रहे हैं। पीएचडी करने वाले विद्यार्थी रामायण पर
आधारित पैंटिंग और रामलीला भी करते हैं।
भारत के मंदिरों का इतिहास खोज निकाला
अमेरिका
के #डॉ. स्टीफन कनाप ने बताया कि उन्हें हर विषय की गहराई में जाना अच्छा
लगता है। 1973-74 में रामायण के बारे में जानकारी मिली, जिसे पढ़ा और इसकी
खोज में भारत आया। यहां रामायण के संबंध में काफी खोज की। अनेक किताबें लिख
चुके #डॉ. स्टीफन ने बताया कि उन्होंने भारत के मंदिरों के इतिहास की खोज
कर उन पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं।
हिन्दू
पुराणों और शास्त्रों में इतना गूढ़ रहस्य है कि अगर मनुष्य उसको ठीक से
पढ़कर समझे तो सुखी स्वस्थ और सम्मानित  जीवन जी सकता है । इस लोक में तो
सुखी रह सकता और परलोक में भी सुखी रह सकता है ।
जिसके
जीवन में #हिन्दू संस्कृति का ज्ञान नही है उसका जीवन तो धोबी के कुत्ते
जैसा है न घर का न घाट का, इस लोक में भी दुःखी चिंतित और परेशान रहता है
और परलोक में भी नर्क में जाकर दुःख ही पाता है ।
अतः बुद्धिमान व्यक्ति को समय रहते भारतीय #संस्कृति के अनुसार अपने जीवन को ढाल लेना चाहिये ।
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वातावरण प्रदूषण मुक्त कैसे हो?

🚩 *वातावरण प्रदूषण मुक्त कैसे हो?*
विश्व पर्यावरण दिवस : 5 जून
🚩पर्यावरण
प्रदूषण की समस्या पर सन् 1972 में #संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टॉक होम
(स्वीडन) में विश्व भर के देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया।
इसमें 119 देशों ने भाग लिया और पहली बार एक ही पृथ्वी का सिद्धांत मान्य
किया।
Azaad bharat – World_Environment_Day
🚩इसी
सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का जन्म हुआ तथा
प्रति वर्ष 5 जून को #पर्यावरण दिवस आयोजित करके नागरिकों को प्रदूषण की
समस्या से अवगत कराने का निश्चय किया गया। तथा इसका मुख्य उद्देश्य
पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाते हुए #राजनीतिक चेतना जागृत करना और आम
जनता को प्रेरित करना था।
🚩वन
हमारी #धरती की #भूमि के #द्रव्यमान का एक तिहाई हिस्सा आच्छादित करते हैं
तथा अपने महत्वपूर्ण कार्यों तथा सेवाओं द्वारा हमारे ग्रह (पृथ्वी) पर
संभावनाओं को जीवित रखते है। वास्तव में 1.6 अरब लोग अपनी आजीविका के लिए
वनों पर निर्भर हैं।
स्वास्थ्य एवं #पर्यावरण रक्षक प्रकृति के अनमोल उपहार !!
🚩#अन्न,
जल और वायु हमारे जीवन के आधार हैं । सामान्य #मनुष्य प्रतिदिन औसतन 1
किलो अन्न और 2 किलो जल लेता है परंतु इनके साथ वह करीब 10,000 लीटर (12 से
13.5 किलो) #वायु भी लेता है । इसलिए #स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु शुद्ध
वायु अत्यंत आवश्यक है ।
🚩#प्रदूषणयुक्त,
ऋण-आयनों की कमी वाली एवं ओजोन रहित हवा से रोग प्रतिकारक शक्ति का ह्रास
होता है व कई प्रकार की शारीरिक-मानसिक #बीमारियाँ होती हैं ।
🚩#प्रदूषण मुक्त कैसे हो?
🚩#पीपल
का वृक्ष दमानाशक, हृदयपोषक, ऋण-आयनों का खजाना, रोगनाशक, आह्लाद व मानसिक
प्रसन्नता का खजाना  तथा रोगप्रतिकारक शक्ति बढानेवाला है । बुद्धू
बालकों तथा हताश-निराश लोगों को भी #पीपल के स्पर्श एवं उसकी छाया में
बैठने से अमिट #स्वास्थ्य-लाभ व पुण्य-लाभ होता है । #पीपल की जितनी महिमा
गायें, कम है । #पर्यावरण की शुद्धि के लिए जनता-जनार्दन एवं #सरकार को
बबूल, नीलगिरी (यूकेलिप्टस) आदि जीवनशक्ति का ह्रास करनेवाले वृक्ष सड़कों
एवं अन्य स्थानों से #हटाने चाहिए और #पीपल, आँवला, तुलसी, वटवृक्ष व नीम
के वृक्ष दिल खोल के #लगाने चाहिए ।
🚩इससे
#अरबों रुपयों की दवाइयों का खर्च बच जायेगा । ये #वृक्ष शुद्ध वायु के
द्वारा प्राणिमात्र को एक प्रकार का उत्तम भोजन प्रदान करते हैं ।
🚩#पीपल
: यह धुएँ तथा धूलि के दोषों को वातावरण से सोखकर #पर्यावरण की रक्षा
करनेवाला एक महत्त्वपूर्ण वृक्ष है । यह #चौबीसों घंटे #ऑक्सीजन उत्सर्जित
करता है । इसके नित्य स्पर्श से रोग-प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि,
मनःशुद्धि, आलस्य में कमी, ग्रहपीड़ा का शमन, शरीर के आभामंडल की शुद्धि और
विचारधारा में धनात्मक परिवर्तन होता है । बालकों के लिए #पीपल का स्पर्श
बुद्धिवर्धक है । #रविवार को पीपल का स्पर्श न करें ।
🚩#आँवला
: #आँवले का वृक्ष #भगवान #विष्णु को प्रिय है । इसके #स्मरणमात्र से
#गोदान का फल प्राप्त होता है । इसके दर्शन से दुगना और फल खाने से तिगुना
पुण्य होता है । #आँवले के वृक्ष का #पूजन कामनापूर्ति में सहायक है ।
#कार्तिक में आँवले के वन में भगवान श्रीहरि की पूजा तथा आँवले की छाया में
भोजन पापनाशक है । #आँवले के वृक्षों से वातावरण में ऋणायनों की वृद्धि
होती है तथा शरीर में शक्ति का, धनात्मक ऊर्जा का संचार होता है ।
🚩#आँवले
से नित्य स्नान पुण्यमय माना जाता है और #लक्ष्मीप्राप्ति में सहायक है ।
जिस #घर में सदा #आँवला रखा रहता है वहाँ भूत, प्रेत और राक्षस नहीं जाते ।
🚩#तुलसी
: #प्रदूषित #वायु के #शुद्धीकरण में #तुलसी का #योगदान सर्वाधिक है ।
#तुलसी का पौधा उच्छ्वास में स्फूर्तिप्रद ओजोन वायु छोडता है, जिसमें
#ऑक्सीजन के दो के स्थान पर तीन परमाणु होते हैं । #ओजोन वायु वातावरण के
बैक्टीरिया, वायरस, फंगस आदि को नष्ट करके #ऑक्सीजन में रूपांतरित हो जाती
है । #तुलसी उत्तम प्रदूषणनाशक है । #फ्रेंच डॉ. विक्टर रेसीन कहते हैं :
‘#तुलसी एक अद्भुत औषधि है । यह रक्तचाप व #पाचनक्रिया का नियमन तथा रक्त
की वृद्धि करती है ।
🚩#वटवृक्ष
: यह #वैज्ञानिक दृष्टि से #पृथ्वी में #जल की मात्रा का स्थिरीकरण
करनेवाला एकमात्र #वृक्ष है । यह भूमिक्षरण को रोकता है । इस वृक्ष के
समस्त भाग #औषधि का कार्य करते हैं । यह #स्मरणशक्ति व एकाग्रता की वृद्धि
करता है । इसमें देवों का वास माना जाता है । इसकी छाया में #साधना करना
बहुत लाभदायी है । #वातावरण-शुद्धि में सहायक हवन के लिए वट और पीपल की
समिधा का वैज्ञानिक महत्त्व है ।
🚩#नीम
: #नीम की #शीतल छाया कितनी सुखद और तृप्तिकर होती है, इसका अनुभव सभीको
होगा । #नीम में ऐसी #कीटाणुनाशक शक्ति मौजूद है कि यदि #नियमित #नीम की
छाया में दिन के समय विश्राम किया जाय तो सहसा कोई #रोग होने की सम्भावना
ही नहीं रहती ।
🚩#नीम
के अंग-प्रत्यंग (पत्तियाँ, फूल, फल, छाल, लकडी) उपयोगी और औषधियुक्त होते
हैं । इसकी कोंपलों और पकी हुई पत्तियों में #प्रोटीन, कैल्शियम, लौह और
विटामिन ‘ए पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं ।
🚩#नोट
: #नीलगिरी के वृक्ष भूल से भी न लगायें, ये जमीन को बंजर बना देते हैं ।
जिस #भूमि पर ये लगाये जाते हैं उसकी शुद्धि 12 वर्ष बाद होती है, ऐसा माना
जाता है । इसकी #शाखाओं पर ज्यादातर पक्षी घोंसला नहीं बनाते, इसके मूल
में प्रायः कोई प्राणी बिल नहीं बनाते, यह इतना हानिकारक, जीवन-विघातक
वृक्ष है।
 🚩
हे समझदार मनुष्यो ! पक्षी एवं प्राणियों जितनी अक्ल तो हमें रखनी चाहिए ।
हानिकर वृक्ष हटाओ और तुलसी, पीपल, नीम, वटवृक्ष, आँवला आदि लगाओ ।
🚩#पूज्य
#बापू जी कहते हैं कि ये #वृक्ष लगाने से आपके द्वारा प्राणिमात्र की बड़ी
सेवा होगी । यह लेख पढने के बाद #सरकार में अमलदारों व अधिकारियों को सूचित
करना भी एक सेवा होगी । खुद #वृक्ष लगाना और दूसरों को प्रेरित करना भी एक
#सेवा होगी ।
🚩 (सोस्त्र : संत श्री आसारामजी आश्रम से प्रकाशित ऋषि प्रसाद अगस्त 2009 )
🚩विश्व पर्यावरण दिवस पर ‘इतना’ तो हम कर ही सकते हैं ।
🚩#सरकार
जितने भी नियम-कानून लागू करें उसके साथ-साथ #जनता की जागरूकता से ही
#पर्यावरण की रक्षा संभव हो सकेगी । इसके लिए कुछ अत्यंत सामान्य बातों को
जीवन में दृढ़ता-पूर्वक अपनाना आवश्यक है।
🚩जैसे –
🚩1.
प्रत्येक व्यक्ति प्रति वर्ष यादगार अवसरों (#जन्मदिन, #विवाह की
#वर्षगांठ) पर अपने घर, मंदिर या ऐसे स्थल पर फलदार अथवा औषधीय #पौधा-रोपण
करें, जहां उसकी देखभाल हो सके।
 🚩2.#उपहार में भी सबको #पौधे दें।
🚩3.शिक्षा
संस्थानों व #कार्यालयों में विद्यार्थी, #शिक्षक, अधिकारी और कर्मचारीगण
राष्ट्रीय पर्व तथा महत्त्वपूर्ण तिथियों पर पौधे रोपें।
🚩4.विद्यार्थी एक #संस्था में जितने वर्ष अध्ययन करते हैं, उतने पौधे लगाएं और जीवित भी रखें।
🚩5.प्रत्येक #गांव/शहर में हर मुहल्ले व कॉलोनी में #पर्यावरण संरक्षण समिति बनाई जाए।
🚩6.निजी वाहनों का #उपयोग कम से कम किया जाए।
🚩7.#रेडियो-टेलीविजन की आवाज धीमी रखें। सदैव धीमे स्वर में बात करें। घर में पार्टी हो तब भी शोर न होने दें।
🚩8.जल व्यर्थ न बहाएं। गाड़ी धोने या पौधों को पानी देने में #इस्तेमाल किये गए पानी का प्रयोग करें।
 🚩9.अनावश्यक #बिजली की बत्ती जलती न छोडें। पोलोथिन का उपयोग न करें। कचरा कूड़ेदान में ही डालें।
🚩10.अपना #मकान बनवा रहे हों तो उसमें वर्षा के जल-संरक्षण और उद्यान के लिए जगह अवश्य रखें।
🚩ऐसी
अनेक छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देकर भी पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है।
ये आपके कई अनावश्यक खर्चों में तो कमी लाएंगे साथ ही पर्यावरण के प्रति
अपनी ज़िम्मेदारी निभाने की आत्मसंतुष्टि भी देंगे।
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महाराणा प्रताप जयंती 28 मई

महाराणा प्रताप जयंती 28 मई

 

महाराणा प्रतापका परिचय
maharana pratap

 

जिनका
नाम लेकर दिनका शुभारंभ करे, ऐसे नामोंमें एक हैं, महाराणा प्रताप । उनका
नाम उन पराक्रमी राजाओंकी सूचिमें सुवर्णाक्षरोंमें लिखा गया है, जो देश,
धर्म, संस्कृति तथा इस देशकी स्वतंत्रताकी रक्षा हेतु जीवनभर जूझते रहे !
उनकी वीरताकी पवित्र स्मृतिको यह विनम्र अभिवादन  है ।
मेवाडके
महान राजा, महाराणा प्रताप सिंहका नाम कौन नहीं जानता ? भारतके इतिहासमें
यह नाम वीरता, पराक्रम, त्याग तथा देशभक्ति जैसी विशेषताओं हेतु निरंतर
प्रेरणादाई रहा है । मेवाडके सिसोदिया परिवारमें जन्मे अनेक पराक्रमी
योद्धा, जैसे बाप्पा रावल, राणा हमीर, राणा संगको ‘राणा’ यह उपाधि दी गई;
अपितु ‘ महाराणा ’ उपाधिसे  केवल प्रताप सिंहको सम्मानित किया गया ।
महाराणा प्रतापका बचपन
महाराणा
प्रतापका जन्म वर्ष 1540 में हुआ । मेवाडके राणा उदय सिंह, द्वितीय, के ३३
बच्चे थे । उनमें प्रताप सिंह सबसे बडे थे । स्वाभिमान तथा धार्मिक आचरण
प्रताप सिंहकी विशेषता थी । महाराणा प्रताप बचपनसे ही ढीठ तथा बहादूर थे;
बडा होनेपर यह एक महापराक्रमी पुरुष बनेगा, यह सभी जानते थे । सर्वसाधारण
शिक्षा लेनेसे खेलकूद एवं हथियार बनानेकी कला सीखनेमें उसे अधिक रुचि थी ।
महाराणा प्रतापका राज्याभिषेक !
महाराणा
प्रताप सिंहके कालमें देहलीपर अकबर बादशाहका शासन था । हिंदू राजाओंकी
शक्तिका उपयोग कर दूसरे  हिंदू राजाओंको अपने नियंत्रणमें लाना, यह उसकी
नीति थी । कई रजपूत राजाओंने अपनी महान परंपरा तथा लडनेकी वृत्ति छोडकर
अपनी बहुओं तथा कन्याओंको अकबरके अंत:पूरमें भेजा ताकि उन्हें अकबरसे इनाम
तथा मानसम्मान मिलें । अपनी मृत्यूसे पहले उदय सिंगने उनकी सबसे छोटी
पत्नीका बेटा जगम्मलको राजा घोषित किया; जबकि प्रताप सिंह जगम्मलसे बडे थे,
प्रभु रामचंद्र जैसे अपने छोटे भाईके लिए अपना अधिकार छोडकर मेवाडसे निकल
जानेको तैयार थे । किंतु सभी सरदार राजाके निर्णयसे सहमत नहीं हुए । अत:
सबने मिलकर यह निर्णय लिया कि जगमलको सिंहासनका त्याग करना पडेगा । महाराणा
प्रताप सिंहने भी सभी सरदार तथा लोगोंकी इच्छाका आदर करते हुए मेवाडकी
जनताका नेतृत्व करनेका दायित्व स्वीकार किया ।
महाराणा प्रतापकी अपनी मातृभूमिको मुक्त करानेकी अटूट प्रतिज्ञा !
महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो, लम्बाई 7’5”थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे ।
महाराणा
प्रतापके शत्रुओंने मेवाडको चारों ओरसे घेर लिया था । महाराणा प्रतापके दो
भाई, शक्ति सिंह एवं जगमल अकबरसे मिले हुए थे । सबसे बडी समस्या थी आमने-
सामने लडने हेतु सेना खडी करना, जिसके लिए बहुत धनकी आवश्यकता थी ।
महाराणा
प्रतापकी सारी संदूके खाली थीं, जबकी अकबरके पास बहुत बडी सेना, अत्यधिक
संपत्ति तथा और भी सामग्री बडी मात्रामें थी । किंतु महाराणा प्रताप निराश
नहीं हुए अथवा कभी भी ऐसा नहीं सोचा कि वे अकबरसे किसी बातमें न्यून(कम)
हैं ।
महाराणा
प्रतापको एक ही चिंता थी, अपनी मातभूमिको मुगलोंके चंगुलसे मुक्त कराणा था
। एक दिन उ्न्होंने अपने विश्वासके सारे सरदारोंकी बैठक बुलाई तथा अपने
गंभीर एवं वीरतासे भरे शब्दोंमें उनसे आवाहन किया ।
उन्होंने
कहा,‘ मेरे बहादूर बंधुआ, अपनी मातृभूमि, यह पवित्र मेवाड अभी भी मुगलोंके
चंगुलमें है । आज मैं आप सबके सामने प्रतिज्ञा करता हूं कि, जबतक चितौड
मुक्त नहीं हो जाता, मैं सोने अथवा चांदीकी थालीमें खाना नहीं खाऊंगा,
मुलायम गद्देपर नहीं सोऊंगा तथा राजप्रासादमें भी नहीं रहुंगा; इसकी
अपेक्षा मैं पत्तलपर खाना खाउंगा, जमीनपर सोउंगा तथा झोपडेमें रहुंगा ।
जबतक चितौड मुक्त नहीं हो जाता, तबतक मैं दाढी भी नहीं बनाउंगा । मेरे
पराक्रमी वीरों, मेरा विश्वास है कि आप अपने तन-मन-धनका त्याग कर यह
प्रतिज्ञा पूरी होनेतक मेरा साथ दोगे ।
अपने
राजाकी प्रतिज्ञा सुनकर सभी सरदार प्रेरित हो गए, तथा उन्होंने अपने
राजाकी तन-मन-धनसे सहायता करेंगे तथा शरीरमें  रक्तकी आखरी बूंदतक उसका साथ
देंगे; किसी भी परिस्थितिमें मुगलोंसे चितौड मुक्त होनेतक अपने ध्येयसे
नहीं हटेंगे, ऐसी प्रतिज्ञा की  । उन्होंने महाराणासे कहा, विश्वास करो, हम
सब आपके साथ हैं, आपके एक संकेतपर अपने प्राण न्यौछावर कर देंगे ।
अकबर
अपने महल में जब वह सोता था तब महाराणा प्रताप का नाम सुनकर रात में नींद
में कांपने लगता था। अकबर की हालत देख उसकी पत्नियां भी घबरा जाती, इस
दौरान वह जोर-जोर से महाराणा प्रताप का नाम लेता था।
हल्दीघाटकी लडाई महाराणा प्रताप एक महान योद्धा
अकबरने
महाराणा प्रतापको अपने चंगुलमें लानेका अथक प्रयास किया किंतु सब व्यर्थ
सिद्ध हुआ! महाराणा प्रतापके साथ जब कोई समझौता नहीं हुआ, तो अकबर अत्यंत
क्रोधित हुआ और उसने युद्ध घोषित किया । महाराणा प्रतापने भी सिद्धताएं
आरंभ कर दी । उसने अपनी राजधानी अरवली पहाडके दुर्गम क्षेत्र कुंभलगढमें
स्थानांतरित की । महाराणा प्रतापने अपनी सेनामें आदिवासी तथा जंगलोंमें
रहनेवालोंको भरती किया । इन लोगोंको युद्धका कोई  अनुभव नहीं था, किंतु
उसने उन्हें प्रशिक्षित किया । उसने सारे रजपूत सरदारोंको मेवाडके
स्वतंत्रताके झंडेके नीचे इकट्ठा होने हेतु आवाहन किया ।
महाराणा
प्रतापके 22,000 सैनिक अकबरकी 80,000 सेनासे हल्दीघाटमें भिडे । महाराणा
प्रताप तथा उसके सैनिकोंने युद्धमें बडा पराक्रम दिखाया किंतु उसे पीछे
हटना पडा। अकबरकी सेना भी राणा प्रतापकी सेनाको पूर्णरूपसे पराभूत करनेमें
असफल रही । महाराणा प्रताप एवं उसका विश्वसनीय घोडा ‘ चेतक ’ इस युद्धमें
अमर हो गए । हल्दीघाटके युद्धमें ‘ चेतक ’ गंभीर रुपसे घायल हो गया था;
किंतु अपने स्वामीके प्राण बचाने हेतु उसने एक नहरके उस पार लंबी छलांग
लगाई । नहरके पार होते ही ‘ चेतक ’ गिर गया और वहीं उसकी मृत्यु  हुई । इस
प्रकार अपने प्राणोंको संकटमें डालकर उसने राणा प्रतापके प्राण बचाएं ।
लोहपुरुष महाराणा अपने विश्वसनीय घोडेकी मृत्यूपर एक बच्चेकी तरह फूट-फूटकर
रोया ।
तत्पश्चात
जहां चेतकने अंतिम सांस ली थी वहां उसने एक सुंदर उद्यानका निर्माण किया ।
अकबरने महाराणा प्रतापपर आक्रमण किया किंतु छह महिने युद्धके उपरांत भी
अकबर महाराणाको पराभूत न कर सका; तथा वह देहली लौट गया । अंतिम उपायके
रूपमें अकबरने एक पराक्रमी योद्धा सरसेनापति जगन्नाथको 1584 में बहुत बडी
सेनाके साथ मेवाडपर भेजा, दो वर्षके अथक प्रयासोंके पश्चात भी वह राणा
प्रतापको नहीं पकड सका ।
महाराणा प्रतापका कठोर प्रारब्ध
जंगलोंमें
तथा पहाडोंकी घाटियोंमें भटकते हुए राणा प्रताप अपना परिवार अपने साथ रखते
थे । शत्रूके कहींसे भी तथा कभी भी आक्रमण करनेका संकट सदैव  बना रहता था ।
जंगलमें ठीकसे खाना प्राप्त होना बडा कठिन था । कई बार उन्हें खाना छोडकर,
बिना खाए-पिए ही प्राण बचाकर जंगलोंमें भटकना पडता था ।
शत्रूके
आनेकी खबर मिलते ही एक स्थानसे दूसरे स्थानकी ओर भागना पडता था । वे सदैव
किसी न किसी संकटसे घिरे रहते थे ।  एक बार महारानी जंगलमें रोटियां  सेंक
रही थी; उनके खानेके बाद उसने अपनी बेटीसे कहा कि, बची हुई रोटी रातके
खानेके लिए रख दे; किंतु उसी समय एक जंगली बिल्लीने झपट्टा मारकर रोटी छीन
ली और राजकन्या असहायतासे रोती रह गई । रोटीका वह टुकडा भी उसके
प्रारब्धमें नहीं था । राणा प्रतापको बेटीकी यह स्थिति देखकर बडा दुख हुआ,
अपनी वीरता, स्वाभिमानपर उसे बहुत क्रोध आया तथा विचार करने लगा कि उसका
युद्ध करना कहांतक उचित है ! मनकी इस द्विधा स्थितिमें उसने अकबरके साथ
समझौता करनेकी बात मान ली ।
पृथ्वीराज,
अकबरके दरबारका एक कवी जिसे राणा प्रताप बडा प्रिय था, उसने राजस्थानी
भाषामें राणा प्रतापका आत्मविश्वास बढाकर उसे अपने निर्णयसे परावृत्त
करनेवाला पत्र कविताके रुपमें लिखा । पत्र पढकर राणा प्रतापको लगा जैसे उसे
10,000 सैनिकोंका बल प्राप्त हुआ हो । उसका मन स्थिर तथा शांत हुआ ।
अकबरकी  शरणमें जानेका विचार उसने अपने मनसे निकाल दिया तथा अपने
ध्येयसिद्धि हेतु सेना अधिक संगठित करनेके प्रयास आरंभ किए ।
भामाशाहकी
महाराणाके प्रति भक्ति महाराणा प्रतापके वंशजोेंके दरबारमें एक रजपूत
सरदार था । राणा प्रताप जिन संकटोंसे मार्गक्रमण रहा था तथा जंगलोंमें भटक
रहा था, इससे वह बडा दुखी हुआ । उसने राणा प्रतापको  ढेर सारी संपत्ति दी,
जिससे वह 25,000 की सेना 12 वर्षतक रख सके । महाराणा प्रतापको बडा आनंद हुआ
एवं कृतज्ञता भी लगी ।
आरंभमें
महाराणा प्रतापने भामाशाहकी सहायता स्वीकार करनेसे मना किया किंतु उनके
बार-बार कहनेपर राणाने संपात्तिका स्वीकार किया । भामाशाहसे धन प्राप्त
होनेके पश्चात राणा प्रतापको दूसरे स्रोतसे धन प्राप्त होना आरंभ हुआ ।
उसने सारा धन अपनी सेनाका विस्तार करनेमें लगाया तथा चितोड छोडकर मेवाडको
मुक्त किया ।
अपने
शासनकाल में उन्होने युद्ध में उजड़े गाँवों को पुनः व्यवस्थित किया। नवीन
राजधानी चावण्ड को अधिक आकर्षक बनाने का श्रेय महाराणा प्रताप को जाता है।
राजधानी के भवनों पर कुम्भाकालीन स्थापत्य की अमिट छाप देखने को मिलती है।
पद्मिनी चरित्र की रचना तथा दुरसा आढा की कविताएं महाराणा प्रताप के युग को
आज भी अमर बनाये हुए हैं।
महाराणा प्रतापकी अंतिम इच्छा
महाराणा
प्रतापकी मृत्यु हो रही थी, तब वे घासके बिछौनेपर सोए थे, क्योंकि चितोडको
मुक्त करनेकी उनकी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हुई थी । अंतिम क्षण उन्होंने अपने
बेटे अमर सिंहका हाथ अपने हाथमें लिया तथा चितोडको मुक्त करनेका दायित्व
उसे सौंपकर शांतिसे परलोक सिधारे । क्रूर बादशाह अकबरके साथ उनके युद्धकी
इतिहासमें कोई तुलना नहीं । जब लगभग पूरा राजस्थान मुगल बादशाह अकबरके
नियंत्रणमें था, महाराणा प्रतापने मेवाडको बचानेके लिए 12 वर्ष युद्ध किया
अकबरने
महाराणाको पराभूत करनेके लिए बहुत प्रयास किए किंतु अंततक वह अपराजित ही
रहा । इसके अतिरिक्त उसने राजस्थानका बहुत बडा क्षेत्र मुगलोंसे मुक्त किया
। कठिन संकटोंसे जानेके पश्चात भी उसने अपना तथा अपनी मातृभूमिका नाम
पराभूत होनेसे बचाया । उनका पूरा जीवन इतना उज्वल था कि स्वतंत्रताका दूसरा
नाम ‘ महाराणा प्रताप ’ हो सकता है । उनकी पराक्रमी स्मृतिको हम
श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं ।
महाराणा
प्रताप में अच्छे सेनानायक के गुणों के साथ-साथ अच्छे व्यस्थापक की
विशेषताएँ भी थी। अपने सीमित साधनों से ही अकबर जैसी शक्ति से दीर्घ काल तक
टक्कर लेने वाले वीर महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर भी दुःखी हुआ था।
आज
भी महाराणा प्रताप का नाम असंख्य भारतीयों के लिये #प्रेरणास्रोत है। राणा
प्रताप का स्वाभिमान भारत माता की पूंजी है। वह अजर अमरता के गौरव तथा
मानवता के विजय सूर्य है। राणा प्रताप की देशभक्ति, पत्थर की अमिट लकीर है।
ऐसे #पराक्रमी भारत माँ के वीर सपूत महाराणा प्रताप को #राष्ट्र का
#शत्-शत् नमन।
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गंगा दशहरा प्रारम्भ : 26 मई, समाप्त : 4 जून

मां गंगा की महिमा
गंगा दशहरा प्रारम्भ : 26 मई, समाप्त : 4 जून
गंगा
नदी उत्तर भारतकी केवल जीवनरेखा नहीं, अपितु हिंदू धर्मका सर्वोत्तम तीर्थ
है । ‘आर्य सनातन वैदिक संस्कृति’ गंगाके तटपर विकसित हुई, इसलिए गंगा
हिंदुस्थानकी राष्ट्ररूपी अस्मिता है एवं भारतीय संस्कृतिका मूलाधार है ।
इस कलियुगमें श्रद्धालुओंके पाप-ताप नष्ट हों, इसलिए ईश्वरने उन्हें इस
धरापर भेजा है । वे प्रकृतिका बहता जल नहीं; अपितु सुरसरिता (देवनदी) हैं ।
उनके प्रति हिंदुओंकी आस्था गौरीशंकरकी भांति सर्वोच्च है । गंगाजी
मोक्षदायिनी हैं; इसीलिए उन्हें गौरवान्वित करते हुए पद्मपुराणमें (खण्ड ५,
अध्याय ६०, श्लोक ३९) कहा गया है, ‘सहज उपलब्ध एवं मोक्षदायिनी गंगाजीके
रहते विपुल धनराशि व्यय (खर्च) करनेवाले यज्ञ एवं कठिन तपस्याका क्या लाभ
?’ नारदपुराणमें तो कहा गया है, ‘अष्टांग योग, तप एवं यज्ञ, इन सबकी
अपेक्षा गंगाजीका निवास उत्तम है । गंगाजी भारतकी पवित्रताकी सर्वश्रेष्ठ
केंद्रबिंदु हैं, उनकी महिमा अवर्णनीय है ।’
ganga dashahara
मां गंगा का #ब्रह्मांड में उत्पत्ति
‘वामनावतारमें
श्रीविष्णुने दानवीर बलीराजासे भिक्षाके रूपमें तीन पग भूमिका दान मांगा ।
राजा इस बातसे अनभिज्ञ था कि श्रीविष्णु ही वामनके रूपमें आए हैं, उसने
उसी क्षण वामनको तीन पग भूमि दान की । वामनने विराट रूप धारण कर पहले पगमें
संपूर्ण पृथ्वी तथा दूसरे पगमें अंतरिक्ष व्याप लिया । दूसरा पग उठाते समय
वामनके ( #श्रीविष्णुके) बाएं पैरके अंगूठेके धक्केसे ब्रह्मांडका
सूक्ष्म-जलीय कवच (टिप्पणी १) टूट गया । उस छिद्रसे गर्भोदककी भांति
‘ब्रह्मांडके बाहरके सूक्ष्म-जलनेब्रह्मांडमें प्रवेश किया । यह सूक्ष्म-जल
ही गंगा है ! गंगाजीका यह प्रवाह सर्वप्रथम सत्यलोकमें गया ।ब्रह्मदेवने
उसे अपने कमंडलु में धारण किया । तदुपरांत सत्यलोकमें ब्रह्माजीने अपने
कमंडलुके जलसे श्रीविष्णुके चरणकमल धोए । उस जलसे गंगाजीकी उत्पत्ति हुई ।
तत्पश्चात गंगाजी की यात्रा सत्यलोकसे क्रमशः #तपोलोक, #जनलोक, #महर्लोक,
इस मार्गसे #स्वर्गलोक तक हुई ।
पृथ्वी पर उत्पत्ति
 #सूर्यवंशके राजा सगरने #अश्वमेध यज्ञ आरंभ किया । उन्होंने दिग्विजयके
लिए यज्ञीय अश्व भेजा एवं अपने ६० सहस्त्र पुत्रोंको भी उस अश्वकी रक्षा
हेतु भेजा । इस यज्ञसे भयभीत इंद्रदेवने यज्ञीय अश्वको कपिलमुनिके आश्रमके
निकट बांध दिया । जब सगरपुत्रोंको वह अश्व कपिलमुनिके आश्रमके निकट प्राप्त
हुआ, तब उन्हें लगा, ‘कपिलमुनिने ही अश्व चुराया है ।’ इसलिए सगरपुत्रोंने
ध्यानस्थ कपिलमुनिपर आक्रमण करनेकी सोची । कपिलमुनिको अंतर्ज्ञानसे यह बात
ज्ञात हो गई तथा अपने नेत्र खोले । उसी क्षण उनके नेत्रोंसे प्रक्षेपित
तेजसे सभी सगरपुत्र भस्म हो गए । कुछ समय पश्चात सगरके प्रपौत्र राजा
अंशुमनने सगरपुत्रोंकी मृत्युका कारण खोजा एवं उनके उद्धारका मार्ग पूछा ।
कपिलमुनिने अंशुमनसे कहा, ‘`गंगाजीको स्वर्गसे भूतलपर लाना होगा ।
सगरपुत्रोंकी अस्थियोंपर जब गंगाजल प्रवाहित होगा, तभी उनका उद्धार होगा
!’’ मुनिवरके बताए अनुसार गंगाको पृथ्वीपर लाने हेतु अंशुमनने तप आरंभ किया
।’  ‘अंशुमनकी मृत्युके पश्चात उसके सुपुत्र राजा दिलीपने भी गंगावतरणके
लिए तपस्या की । #अंशुमन एवं दिलीपके सहस्त्र वर्ष तप करनेपर भी गंगावतरण
नहीं हुआ; परंतु तपस्याके कारण उन दोनोंको स्वर्गलोक प्राप्त हुआ ।’
(वाल्मीकिरामायण, काण्ड १, अध्याय ४१, २०-२१)
‘राजा
दिलीपकी #मृत्युके पश्चात उनके पुत्र राजा भगीरथने कठोर तपस्या की । उनकी
इस तपस्यासे प्रसन्न होकर गंगामाताने भगीरथसे कहा, ‘‘मेरे इस प्रचंड
प्रवाहको सहना पृथ्वीके लिए कठिन होगा । अतः तुम भगवान शंकरको प्रसन्न करो
।’’ आगे भगीरथकी घोर तपस्यासे भगवान शंकर प्रसन्न हुए तथा भगवान शंकरने
गंगाजीके प्रवाहको जटामें धारण कर उसे पृथ्वीपर छोडा । इस प्रकार हिमालयमें
अवतीर्ण गंगाजी भगीरथके पीछे-पीछे #हरद्वार, प्रयाग आदि स्थानोंको पवित्र
करते हुए बंगालके उपसागरमें (खाडीमें) लुप्त हुईं ।’
ज्येष्ठ
मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि, भौमवार (मंगलवार) एवं हस्त नक्षत्रके शुभ
योगपर #गंगाजी स्वर्गसे धरतीपर अवतरित हुईं ।  जिस दिन #गंगा पृथ्वी पर
अवतरित हुईं वह दिन ‘गंगा दशहरा’ के नाम से जाना जाता है ।
जगद्गुरु
आद्य शंकराचार्यजी, जिन्होंने कहा है : एको ब्रह्म द्वितियोनास्ति ।
द्वितियाद्वैत भयं भवति ।। उन्होंने भी ‘गंगाष्टक’ लिखा है, गंगा की महिमा
गायी है । रामानुजाचार्य, रामानंद स्वामी, चैतन्य महाप्रभु और स्वामी
रामतीर्थ ने भी गंगाजी की बड़ी महिमा गायी है । कई साधु-संतों,
अवधूत-मंडलेश्वरों और जती-जोगियों ने गंगा माता की कृपा का अनुभव किया है,
कर रहे हैं तथा बाद में भी करते रहेंगे ।
अब
तो विश्व के #वैज्ञानिक भी गंगाजल का परीक्षण कर दाँतों तले उँगली दबा रहे
हैं ! उन्होंने दुनिया की तमाम नदियों के जल का परीक्षण किया परंतु गंगाजल
में रोगाणुओं को नष्ट करने तथा आनंद और सात्त्विकता देने का जो अद्भुत गुण
है, उसे देखकर वे भी आश्चर्यचकित हो उठे ।
 #हृषिकेश में स्वास्थ्य-अधिकारियों ने पुछवाया कि यहाँ से हैजे की कोई खबर
नहीं आती, क्या कारण है ? उनको बताया गया कि यहाँ यदि किसीको हैजा हो जाता
है तो उसको गंगाजल पिलाते हैं । इससे उसे दस्त होने लगते हैं तथा हैजे के
कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और वह स्वस्थ हो जाता है । वैसे तो हैजे के समय
घोषणा कर दी जाती है कि पानी उबालकर ही पियें । किंतु गंगाजल के पान से तो
यह रोग मिट जाता है और केवल हैजे का रोग ही मिटता है ऐसी बात नहीं है, अन्य
कई रोग भी मिट जाते हैं । तीव्र व दृढ़ श्रद्धा-भक्ति हो तो गंगास्नान व
गंगाजल के पान से जन्म-मरण का रोग भी मिट सकता है ।
सन्
1947 में जलतत्त्व विशेषज्ञ कोहीमान भारत आया था । उसने वाराणसी से
#गंगाजल लिया । उस पर अनेक परीक्षण करके उसने विस्तृत लेख लिखा, जिसका सार
है – ‘इस जल में कीटाणु-रोगाणुनाशक विलक्षण शक्ति है ।’
दुनिया
की तमाम #नदियों के जल का विश्लेषण करनेवाले बर्लिन के डॉ. जे. ओ. लीवर ने
सन् 1924 में ही गंगाजल को विश्व का सर्वाधिक स्वच्छ और
#कीटाणु-रोगाणुनाशक जल घोषित कर दिया था ।
‘आइने
अकबरी’ में लिखा है कि ‘अकबर गंगाजल मँगवाकर आदरसहित उसका पान करते थे ।
वे गंगाजल को अमृत मानते थे ।’ औरंगजेब और मुहम्मद तुगलक भी गंगाजल का पान
करते थे । शाहनवर के नवाब केवल गंगाजल ही पिया करते थे ।
कलकत्ता
के हुगली जिले में पहुँचते-पहुँचते तो बहुत सारी नदियाँ, झरने और नाले
गंगाजी में मिल चुके होते हैं । अंग्रेज यह देखकर हैरान रह गये कि हुगली
जिले से भरा हुआ गंगाजल दरियाई मार्ग से यूरोप ले जाया जाता है तो भी कई-कई
दिनों तक वह बिगड़ता नहीं है । जबकि यूरोप की कई बर्फीली नदियों का पानी
हिन्दुस्तान लेकर आने तक खराब हो जाता है ।
अभी रुड़की विश्वविद्यालय के #वैज्ञानिक कहते हैं कि ‘गंगाजल में जीवाणुनाशक और हैजे के कीटाणुनाशक तत्त्व विद्यमान हैं ।’
फ्रांसीसी
चिकित्सक हेरल ने देखा कि गंगाजल से कई रोगाणु नष्ट हो जाते हैं । फिर
उसने गंगाजल को कीटाणुनाशक औषधि मानकर उसके इंजेक्शन बनाये और जिस रोग में
उसे समझ न आता था कि इस रोग का कारण कौन-से कीटाणु हैं, उसमें गंगाजल के वे
इंजेक्शन रोगियों को दिये तो उन्हें लाभ होने लगा !
संत #तुलसीदासजी कहते हैं :
गंग सकल मुद मंगल मूला । सब सुख करनि हरनि सब सूला ।।
(श्रीरामचरित. अयो. कां. : 86.2)
सभी
सुखों को देनेवाली और सभी शोक व दुःखों को हरनेवाली माँ गंगा के तट पर
स्थित तीर्थों में पाँच तीर्थ विशेष आनंद-उल्लास का अनुभव कराते हैं :
गंगोत्री, हर की पौड़ी (हरिद्वार),  #प्रयागराज त्रिवेणी, काशी और #गंगासागर
। #गंगादशहरे के दिन गंगा में गोता मारने से सात्त्विकता, प्रसन्नता और
विशेष पुण्यलाभ होता है ।
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वटसावित्री व्रत – अमावस्यांत पक्ष : 25 मई/वटसावित्री व्रतारम्भ ( पूर्णिमांत पक्ष ) : 6 जून

वटसावित्री-व्रत
वटसावित्री व्रत – अमावस्यांत पक्ष : 25 मई/वटसावित्री व्रतारम्भ (पूर्णिमांत पक्ष) : 6 जून
वट पूर्णिमा : 8 जून
24 मई 2017
यह
व्रत ‘स्कंद’ और ‘भविष्योत्तर’ पुराणाेंके अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल
पूर्णिमापर और ‘निर्णयामृत’ इत्यादि ग्रंथोंके अनुसार अमावस्यापर किया जाता
है । उत्तरभारतमें प्रायः अमावस्याको यह व्रत किया जाता है । अतः
महाराष्ट्रमें इसे ‘वटपूर्णिमा’ एवं उत्तरभारतमें इसे ‘वटसावित्री’के नामसे
जाना जाता है ।
वटसावित्री-व्रत
🚩पतिके
सुख-दुःखमें सहभागी होना, उसे संकटसे बचानेके लिए प्रत्यक्ष ‘काल’को भी
चुनौती देनेकी सिद्धता रखना, उसका साथ न छोडना एवं दोनोंका जीवन सफल बनाना,
ये स्त्रीके महत्त्वपूर्ण गुण हैं ।
🚩सावित्रीमें
ये सभी गुण थे । सावित्री अत्यंत तेजस्वी तथा दृढनिश्चयी थीं ।
आत्मविश्वास एवं उचित निर्णयक्षमता भी उनमें थी । राजकन्या होते हुए भी
सावित्रीने दरिद्र एवं अल्पायु सत्यवानको पतिके रूपमें अपनाया था; तथा उनकी
मृत्यु होनेपर यमराजसे शास्त्रचर्चा कर उन्होंने अपने पतिके लिए जीवनदान
प्राप्त किया था । जीवनमें यशस्वी होनेके लिए सावित्रीके समान सभी
सद्गुणोंको आत्मसात करना ही वास्तविक अर्थोंमें वटसावित्री व्रतका पालन
करना है ।
🚩वृक्षों
में भी भगवदीय चेतना का वास है, ऐसा दिव्य ज्ञान #वृक्षोपासना का आधार है ।
इस उपासना ने स्वास्थ्य, प्रसन्नता, सुख-समृद्धि, आध्यात्मिक उन्नति एवं
पर्यावरण संरक्षण में बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है ।
🚩वातावरण
में विद्यमान हानिकारक तत्त्वों को नष्ट कर वातावरण को शुद्ध करने में
वटवृक्ष का विशेष महत्त्व है । वटवृक्ष के नीचे का छायादार स्थल एकाग्र मन
से जप, ध्यान व उपासना के लिए प्राचीन काल से साधकों एवं #महापुरुषों का
प्रिय स्थल रहा है । यह दीर्घ काल तक अक्षय भी बना रहता है । इसी कारण
दीर्घायु, अक्षय सौभाग्य, जीवन में स्थिरता तथा निरन्तर अभ्युदय की
प्राप्ति के लिए इसकी आराधना की जाती है ।
🚩वटवृक्ष
के दर्शन, स्पर्श तथा सेवा से पाप दूर होते हैं; दुःख, समस्याएँ तथा रोग
जाते रहते हैं । अतः इस वृक्ष को रोपने से अक्षय पुण्य-संचय होता है ।
वैशाख आदि पुण्यमासों में इस वृक्ष की जड़ में जल देने से पापों का नाश होता
है एवं नाना प्रकार की सुख-सम्पदा प्राप्त होती है ।
🚩इसी
वटवृक्ष के नीचे सती सावित्री ने अपने पातिव्रत्य के बल से यमराज से अपने
मृत पति को पुनः जीवित करवा लिया था । तबसे ‘#वट-सावित्री’ नामक #व्रत
मनाया जाने लगा । इस दिन महिलाएँ अपने #अखण्ड #सौभाग्य एवं कल्याण के लिए
व्रत करती हैं ।
🚩व्रत-कथा
: सावित्री मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री थी । द्युमत्सेन के पुत्र
सत्यवान से उसका विवाह हुआ था । विवाह से पहले देवर्षि नारदजी ने कहा था कि
सत्यवान केवल वर्ष भर जीयेगा । किंतु सत्यवान को एक बार मन से पति स्वीकार
कर लेने के बाद दृढ़व्रता सावित्री ने अपना निर्णय नहीं बदला और एक वर्ष तक
पातिव्रत्य धर्म में पूर्णतया तत्पर रहकर अंधेे सास-ससुर और अल्पायु पति
की प्रेम के साथ सेवा की । वर्ष-समाप्ति  के  दिन  सत्यवान  और  सावित्री
समिधा लेने के लिए वन में गये थे । वहाँ एक विषधर सर्प ने सत्यवान को डँस
लिया । वह बेहोश  होकर  गिर  गया । यमराज आये और सत्यवान के सूक्ष्म शरीर
को ले जाने लगे । तब सावित्री भी अपने पातिव्रत के बल से उनके पीछे-पीछे
जाने लगी ।
🚩यमराज द्वारा उसे वापस जाने के लिए कहने पर सावित्री बोली :
‘‘जहाँ
जो मेरे पति को ले जाय या जहाँ मेरा पति स्वयं जाय, मैं भी वहाँ जाऊँ यह
सनातन धर्म है । तप, गुरुभक्ति, पतिप्रेम और आपकी कृपा से मैं कहीं रुक
नहीं सकती । #तत्त्व को जाननेवाले विद्वानों ने सात स्थानों पर मित्रता कही
है । मैं उस मैत्री को दृष्टि में रखकर कुछ कहती हूँ, सुनिये । लोलुप
व्यक्ति वन में रहकर धर्म का आचरण नहीं कर सकते और न ब्रह्मचारी या
संन्यासी ही हो सकते हैं ।
🚩विज्ञान
(आत्मज्ञान के अनुभव) के लिए धर्म को कारण कहा करते हैं, इस कारण संतजन
धर्म को ही प्रधान मानते हैं । संतजनों के माने हुए एक ही धर्म से हम दोनों
श्रेय मार्ग को पा गये हैं ।’’
🚩सावित्री के वचनों से प्रसन्न हुए #यमराज से सावित्री ने अपने ससुर के अंधत्व-निवारण व बल-तेज की प्राप्ति का वर पाया ।
🚩सावित्री
बोली : ‘‘#संतजनों के सान्निध्य की सभी इच्छा किया करते हैं । संतजनों का
साथ निष्फल नहीं होता, इस कारण सदैव संतजनों का संग करना चाहिए ।’’
🚩यमराज : ‘‘तुम्हारा वचन मेरे मन के अनुकूल, बुद्धि और बल वर्धक तथा हितकारी है । पति के जीवन के सिवा कोई वर माँग ले ।’’
🚩सावित्री ने श्वशुर के छीने हुए राज्य को वापस पाने का वर पा लिया ।
🚩सावित्री
: ‘‘आपने प्रजा को नियम में बाँध रखा है, इस कारण आपको यम कहते हैं । आप
मेरी बात सुनें । मन-वाणी-अन्तःकरण से किसीके साथ वैर न करना, दान देना,
आग्रह का त्याग करना – यह संतजनों का सनातन धर्म है । संतजन वैरियों पर भी
दया करते देखे जाते हैं ।’’
🚩यमराज बोले : ‘‘जैसे प्यासे को पानी, उसी तरह तुम्हारे वचन मुझे लगते हैं । पति के जीवन के सिवाय दूसरा कुछ माँग ले ।’’
🚩सावित्री ने अपने निपूत पिता के सौ औरस कुलवर्धक पुत्र हों ऐसा वर पा लिया ।
🚩सावित्री
बोली : ‘‘चलते-चलते मुझे कुछ बात याद आ गयी है, उसे भी सुन लीजिये । आप
आदित्य के प्रतापी पुत्र हैं, इस कारण आपको विद्वान पुरुष ‘वैवस्वत’ कहते
हैं । आपका बर्ताव प्रजा के साथ समान भाव से है, इस कारण आपको ‘धर्मराज’
कहते हैं । मनुष्य को अपने पर भी उतना विश्वास नहीं होता जितना संतजनों में
हुआ करता है । इस कारण संतजनों पर सबका प्रेम होता है ।’’
🚩यमराज बोले : ‘‘जो तुमने सुनाया है ऐसा मैंने कभी नहीं सुना ।’’
🚩प्रसन्न
यमराज से सावित्री ने वर के रूप में सत्यवान से ही बल-वीर्यशाली सौ औरस
पुत्रों की प्राप्ति का वर प्राप्त किया । फिर बोली : ‘‘संतजनों की वृत्ति
सदा धर्म में ही रहती है । #संत ही सत्य से सूर्य को चला रहे हैं, तप से
पृथ्वी को धारण कर रहे हैं । संत ही भूत-भविष्य की गति हैं । संतजन दूसरे
पर उपकार करते हुए प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं रखते । उनकी कृपा कभी
व्यर्थ नहीं जाती, न उनके साथ में धन ही नष्ट होता है, न मान ही जाता है ।
ये बातें संतजनों में सदा रहती हैं, इस कारण वे रक्षक होते हैं ।’’
🚩यमराज
बोले : ‘‘ज्यों-ज्यों तू मेरे मन को अच्छे लगनेवाले अर्थयुक्त सुन्दर
धर्मानुकूल वचन बोलती है, त्यों-त्यों मेरी तुझमें अधिकाधिक भक्ति होती
जाती है । अतः हे पतिव्रते और वर माँग ।’’
🚩सावित्री
बोली : ‘‘मैंने आपसे पुत्र दाम्पत्य योग के बिना नहीं माँगे हैं, न मैंने
यही माँगा है कि किसी दूसरी रीति से पुत्र हो जायें । इस कारण आप मुझे यही
वरदान दें कि मेरा पति जीवित हो जाय क्योंकि पति के बिना मैं मरी हुई हूँ ।
पति के बिना मैं सुख, स्वर्ग, श्री और जीवन कुछ भी नहीं चाहती । आपने मुझे
सौ पुत्रों का वर दिया है व आप ही मेरे पति का हरण कर रहे हैं, तब आपके
वचन कैसे सत्य होंगे ? मैं वर माँगती हूँ कि सत्यवान जीवित हो जायें । इनके
जीवित होने पर आपके ही वचन सत्य होंगे ।’’
🚩यमराज ने परम प्रसन्न होकर ‘ऐसा ही हो’ यह  कह  के  सत्यवान  को  मृत्युपाश  से  मुक्त कर दिया ।
🚩व्रत-विधि
: इसमें #वटवृक्ष की पूजा की जाती है । विशेषकर सौभाग्यवती महिलाएँ
श्रद्धा के साथ ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णिमा तक अथवा कृष्ण त्रयोदशी
से अमावास्या तक तीनों दिन अथवा मात्र अंतिम दिन व्रत-उपवास रखती हैं । यह
कल्याणकारक  व्रत  विधवा,  सधवा,  बालिका, वृद्धा, सपुत्रा, अपुत्रा सभी
स्त्रियों को करना चाहिए ऐसा ‘स्कंद पुराण’ में आता है ।
🚩प्रथम
दिन संकल्प करें कि ‘मैं मेरे पति और पुत्रों की आयु, आरोग्य व सम्पत्ति
की प्राप्ति के लिए एवं जन्म-जन्म में सौभाग्य की प्राप्ति के लिए
वट-सावित्री व्रत करती हूँ ।’
🚩वट
के  समीप  भगवान #ब्रह्माजी,  उनकी अर्धांगिनी सावित्री देवी तथा सत्यवान
व सती सावित्री के साथ #यमराज का पूजन कर ‘नमो वैवस्वताय’ इस मंत्र को
जपते हुए वट की परिक्रमा करें । इस समय वट को 108 बार या यथाशक्ति सूत का
धागा लपेटें । फिर निम्न मंत्र से #सावित्री को अर्घ्य दें ।
🚩अवैधव्यं च  सौभाग्यं देहि  त्वं मम  सुव्रते । पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ।।
🚩निम्न श्लोक से वटवृक्ष की प्रार्थना कर गंध, फूल, अक्षत से उसका पूजन करें ।
वट  सिंचामि  ते  मूलं सलिलैरमृतोपमैः । यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले ।
तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मां सदा ।।
🚩#भारतीय
#संस्कृति #वृक्षों  में  भी  छुपी  हुई भगवद्सत्ता  का  ज्ञान
करानेवाली,  ईश्वर  की सर्वश्रेष्ठ कृति- मानव के जीवन में आनन्द, उल्लास
एवं चैतन्यता भरनेवाली है ।
🚩(स्त्रोत्र : संत श्री आशारामजी आश्रम द्वारा प्रकाशित ऋषि प्रसाद, जून 2007)
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केरल में हर दिन होती है एक हिंदू की हत्या, अब तक हो चुकी है 294 हिंदुओं की हत्या

केरल में हर दिन होती है एक हिंदू की हत्या, अब तक हो चुकी है 294 हिंदुओं की हत्या
19 मई 2017
केरल
: हिंदुओं पर लगातार अत्याचार बढ़ता ही जा रहा है। आए दिन हिंदुओं पर हमले
होते हैं जिस वजह से उन्हें पलायन करना पड़ता है। अगर हिन्दू उस हमले का
सामना करते हैं तो उनकी हत्या कर दी जाती है।
ऐसा
ही एक मामला आया है केरल के कन्नूर का। जहां हर रोज लगभग किसी न किसी
हिंदू की बर्बरता से हत्या हो रही है, हर रोज एक हिंदू की मां अपने बेटे के
शव पर रोती है।
Hindus Outraged
केरल
में बीजू नाम का एक हिन्दू वामपंथियों का शिकार हो गया। बीजू को
वामपंथियों ने घेरकर धारदार हथियारों से कत्ल कर दिया। जिसके बाद न्याय
पाने के लिए बीजू के पिता केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप में मिलने रूडी
पहुंचे, जहां उन्होंने मदद की गुहार लगाई है।
आपको बता दें कि पिछले 1 साल में केरल में 294 हिन्दुओं की हत्या हो चुकी है।
केरल के मालाबार में लव जिहाद के ईनाम की घोषणा और संचालन होता है ।
केवल केरल में ही लव जिहाद के 5000 से अधिक मामले कोर्ट के सामने आये हैं ।
रिपोर्ट के अनुसार केरल आदि में तो लव जिहाद के जरिये से 4 लाख करीबन हिन्दू लड़कियाँ गायब हो गई है ।
केरल में ईसाई मिशनरियां भी बहुत सक्रिय है जो हिंदुओं का दिन-रात धर्मान्तरण करवाती रहती है ।
वहाँ
जो भी हिंदुत्वनिष्ठ लव जिहाद, धर्मान्तरण आदि का विरोध करता है उसको वहाँ
से भाग जाने की धमकी मिलती है या उनकी हत्या करवा दी जाती है ।
कब तक हिन्दुस्तान में ही हिन्दू अत्याचार सहता रहेगा?
बांग्लादेश
के प्रोफेसर डॉ. अब्दुल बरकत ने रिपोर्ट अनुसार बताया कि अभी अत्याचार के
कारण जिस तरह बांग्लादेश से हिन्दू पलायन हो रहे है 632 हिंदू रोजाना छोड़
रहे हैं बांग्लादेश । तीन दशक बाद बांग्लादेश में एक भी हिन्दू नहीं बचेगा ।
पाकिस्तान
में भी हिंदू नरक जैसी जिदंगी जी रहे हैं उनकी बहू-बेटियों को उठा ले जाते
हैं, पथराव करते हैं,वहाँ की सरकार भी हिंदुओं को कोई सुरक्षा नही देती है
भारत में भी कश्मीर से #पंडितों को भगा दिया गया और आज भी मुस्लिम बाहुल इलाकों से हिन्दू परिवार पलायन कर रहे हैं।
#ईसाई
मिशनरियाँ और #मुस्लिम देश दिन-रात #हिंदुस्तान और पूरी दुनिया से
हिन्दुस्तान को मिटाने में लगे हैं अतः हिन्दू #सावधान रहें ।
अभी समय है हिन्दू #एक होकर #हिन्दुओं पर हो रहे प्रहार को रोके तभी हिन्दू बच पायेंगे । हिन्दू होगा तभी सनातन संस्कृति बचेगी ।
अगर
#सनातन #संस्कृति नही बचेगी तो दुनिया में इंसानियत ही नही बचेगी क्योंकि
#हिन्दू संस्कृति ही ऐसी है जिसने “वसुधैव कुटुम्बकम्” का वाक्य चरितार्थ
करके दिखाया है ।
#सदाचार व भाई-चारे की भावना अगर किसी #संस्कृति में है तो वो सनातन संस्कृति है ।
#शत्रु को भी क्षमा करने की #ताकत अगर किसी संस्कृति में है तो वो #सनातन संस्कृति है ।
#प्राणिमात्र
में ईश्वरत्व के दर्शन कर, सर्वोत्वकृष्ट ज्ञान प्राप्त कर जीव में से
#शिवत्व को प्रगट करने की क्षमता अगर किसी संस्कृति में है तो वो सनातन
#संस्कृति में है ।
ऐसी #महान संस्कृति में हमारा #जन्म हुआ है , #हिन्दू संस्कृति को बचाने के लिए आज हिंदुओं को ही #संगठित होने की जरुरत है ।
दुनिया में केवल एक मात्र भारत ही हिन्दू बाहुल राष्ट्र है अगर वहाँ पर भी हिन्दू सुरक्षित नही रहेगा तो कहाँ रहेगा?
#हिन्दू_कार्यकर्ताओं और #हिन्दू_संतों को जेल भेज दिया गया , फिर भी हिन्दू सोया हुआ है….!!!
हिन्दू कार्यकर्ताओं की दिन दहाड़े हत्याएं हो रही है, फिर भी हिन्दू सोया है…!!!
कश्मीर से सभी #पंडितों को भगा दिया गया, फिर भी हिन्दू सोया है…!!!
मुस्लिम बाहुल इलाकों से हिंदुओं का पलायन हो रहा है, फिर भी हिन्दू सोया है…!!!
#ईसाई दिन-रात हिंदुओं का #धर्मान्तरण कर रहे हैं , फिर भी हिन्दू सोया है…!!!
एक नही,दो नही, हजार नही , लाखों हिन्दू #लड़कियों को लव जिहाद में फंसाकर ले जाते हैं फिर भी हिन्दू सोया है…!!!
हिंदुओं के #मंदिर तोड़े जा रहे है फिर भी हिन्दू सोया है…!!!
और भी कई ऐसी घटनाएँ है जिस पर हिन्दू मौन धारण करके सोया है…!!!
हिन्दू कब जागेगा नींद से …???
अभी
भी वक्त है हिन्दू #संगठित हो जाएँ । कानून या सरकार आपकी रक्षा नही करेगी
। #धर्म की रक्षा खुद को ही करनी पड़ेगी,इसलिए आपके आस-पास कहीं भी हिन्दू
के साथ #अत्याचार हो रहा हो तो निर्भयता से एक होकर सामना करो ।
हे वीर हिन्दू! जाग अपनी महिमा में…
देश
के साथ गद्दारी करने वाले मीडिया हॉउसस्  , #ईसाई_मिशनरियों
#मुस्लिम_समुदाय के जो भी आतंकी आतंक फैला रहे हैं और जो #राजनीति में
हिन्दू संस्कृति विरोधी बैठे है उनको उखाड़ फैको ।
हे हिन्दू! तू वीर #शिवाजी, #पृथ्वीराज_चौहाण, #वीर_महाराणा प्रताप जैसे वीरों का वंशज है । देश के गद्दारों का सफाया कर दें ।

विदेश की किताबों में बच्चे पढ़ रहे रामायण और महाभारत

विदेश की किताबों में बच्चे पढ़ रहे रामायण और महाभारत
17 मई 2017
भारत
मे भले ही विदेशी लुटेरे मुगलों का और अंग्रेजों की महिमा मंडन वाला
इतिहास पढ़ाया जाता हो लेकिन विदेश में आज भी कई जगह पर भगवान श्री राम और
भगवान श्री कृष्ण की महिमा का इतिहास पढ़ाया जा रहा है और वे लोग बौद्धिक,
आर्थिक और सभी क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं ।
विदेश
की भारत से दूरी लगभग 6 हजार किलोमीटर है ।पर वहां पर मजहबी ठेकेदारों की
ठेकेदारी नहीं चलती और वहाँ पर श्रीराम की रामायण और श्री कृष्ण की महाभारत
कक्षा 11 के पाठ्यक्रम में पढाई जाती है ।
भगवान
श्रीराम , भगवान श्रीकृष्ण , अर्जुन , भीम , नकुल, युधिष्ठिर ऐसी
प्रतिमूर्तियां हैं जिनसे कोई बल,कोई बुद्धि , कोई न्याय, कोई त्याग, कोई
कर्म और कोई धर्म की शिक्षा ले सकता है ।
आपको
ये जान कर आश्चर्य होगा कि दूर देश रोमानिया में कक्षा 11 की
पाठ्यपुस्तकों में रामायण और महाभारत के अंश हैं । ये जानकारी भारत में
रोमानिया के राजदूत डोबरे ने विशेष बातचीत में कहा ।
भारत
और रोमानिया के बीच अत्यंत निकट एवं मजबूत संबंधों को रेखांकित करते हुए
रोमानिया के राजदूत राडू ओक्टावियन डोबरे ने बताया कि, दोनों देशों के निकट
के सांस्कृतिक संबंध हैं और इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि,
हमारे यहां 11वीं कक्षा में बच्चों को रामायण और महाभारत के अंश पढाए जाते
हैं !
इंटरनेशनल
कल्चर खंड में बच्चों को यह पढ़ाया जाता है। आगे उन्होंने कहा कि दोनों
देशों के बीच निकट के सांस्कृतिक संबंध हैं जिन्हें और मजबूत करने की जरूरत
है ।
रामायण, महाभारत व गीता में जीवन की हर समस्या का समाधान है….!!!
हम समाज में किस तरह रहें..?
परिवार में किस तरह रहें …?
अपने कार्य क्षेत्र में कैसे रहें…?
 मित्रों के साथ हमारा व्यवहार कैसा हो…?
ये सभी बातें हम इस ग्रंथ से सीख सकते हैं।
रामायण,
महाभारत एवं श्रीमद्भगवद्गीता  #ग्रंथों की बहुउपयोगिता के कारण ही कई
स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, प्रबंधन #संस्थान ने इस ग्रंथ की सीख व उपदेश
को पाठ्यक्रम में शामिल किया है ।
#आधुनिक
काल में जे. रॉबर्ट आइजनहॉवर ने गीता और महाभारत का गहन अध्ययन किया।
उन्होंने महाभारत में बताए गए #ब्रह्मास्त्र की संहारक क्षमता पर शोध किया
और अपने मिशन को नाम दिया ट्रिनिटी (त्रिदेव)।
रॉबर्ट
के नेतृत्व में 1939 से 1945 के बीच #वैज्ञानिकों की एक टीम ने यह कार्य
किया और #अमेरिका में 16 जुलाई 1945 को पहला परमाणु परीक्षण किया ।
हिन्दू
धार्मिक ग्रंथों में छुपे रहस्यों को उजागर करने के लिए विदेशों में
अनेकों अनुसंधान चल रहे हैं । उसमें विदेशियों को सफलता भी खूब मिल रही है ।
उन्हीं रहस्यों को उजागार करने के लिए अब भारत में विश्वविद्यालय खुलने
लगे हैं । पटना से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित बिद्दूपुर, #वैशाली में
एक विश्वविद्यालय खोला जा रहा है जहाँ रामायण, गीता जैसे धार्मिक ग्रंथों
की पढ़ाई होगी ।
अमेरिका के #न्यूजर्सी में स्थापित कैथोलिक सेटन हॉ यूनिवर्सिटी में गीता को अनिवार्य पाठ्यक्रम के रूप में शामिल किया है ।
#माध्यमिक_शिक्षा_निदेशालय
बीकानेर के डायरेक्टर बी.एल. स्वर्णकार ने आदेश में कहा है कि
‘विद्यार्थियों को गीता का उपयोग सुनिश्चित करते हुए अध्ययन के लिए प्रेरित
करना होगा, जिससे उनका आध्यात्मिक विकास हो सके ।’
कुछ
दिन पहले केंद्रीय मंत्री डॉ. महेश शर्मा ने भी कहा है कि ‘गीता-रामायण
भारत की #सांस्कृतिक व #आध्यात्मिक धरोहर हैं। इसलिए स्कूलों में इनकी
पढ़ाई को अनिवार्य किया जाना चाहिए।
डीपीएस
#भागलपुर की प्रिंसिपल डॉ. #अरुणिमा चक्रवर्ती ने भी बताया है कि रामायण
और महाभारत की कथाएँ पढ़ाने से बच्चों में शालीनता पैदा की जा सकेगी ।
प्रोफेसर
अनामिका गिरधर का कहना है कि’श्रीमदभगवद्गीता’ में चरित्र निर्माण,
आचरण,व्यवहार व विचार को सुंदर एवं अनुपम बनाने की सामग्री मिल जाती है ।
किसी भी सम्प्रदाय,मत या वाद की कोई भी ऐसी पुस्तक नहीं है कि जो इस कसौटी
पर खरी उतरी हो ।
कई विशेषज्ञों का मानना है कि गीता में दिया गया ज्ञान आधुनिक मैनेजमेंट के लिए भी एकदम सटीक है और उससे काफी कुछ सीखा जा सकता है।
 इनका तो यहाँ तक कहना है कि गीता का मैनेजमेंट गुण पश्चिमी देशों के सिर्फ
मुनाफा कमाने के मैनैजमेंट वाली सोच से कहीं बेहतर है क्योंकि गीता इंसान
के पूरे व्यक्तित्व में आत्मिक सुधार की बात करती है ।
इंसान
में सुधार आने के बाद उसके जीवन के हर क्षेत्र में उन्नति तय है और
मैनेजमेंट भी उनमें से एक है । गीता में ऐसे कई श्लोक हैं जो द्वापर युग
में अर्जुन के लिए तो प्रेरणादायी साबित हुए ही थे,अब इस युग में आधुनिक
मैनेजमेंट के भी बहुत काम के हैं । इसलिए आधुनिक मैनेजर गीता ज्ञान से
मैनेजमेंट के गुण सीख रहे हैं ।
#भारत ने वेद-पुराण, उपनिषदों से पूरे विश्व को सही जीवन जीने की ढंग सिखाया है । इससे भारतीय बच्चे ही क्यों वंचित रहे ?
जब
मदरसों में कुरान पढ़ाई जाती है, #मिशनरी के स्कूलों में बाइबल तो हमारे
स्कूल-कॉलेजों में रामायण, महाभारत व गीता क्यों नहीं पढ़ाई जाएँ ?
 मदरसों व मिशनरियों में शिक्षा के माध्यम से धार्मिक उन्माद बढ़ाया जाता
है तो #सेक्युलरवादी उसे संविधान का मौलिक अधिकार कहते है और जब
स्कूलों-कॉलेजों में बच्चों को जीवन जीने का सही ढंग सिखाया जाता है तो
बोलते हैं कि शिक्षा का भगवाकरण हो रहा है ।
अब
समय आ गया है कि पश्चिमी #संस्कृति के #नकारात्मक प्रभाव को दूर किया जाए
और अपनी पुरानी #संस्कृति को अपनाया जाए। #हिंदुत्व को बढ़ावा दिया जाना
भगवाकरण नहीं है।’ अपितु उसमें मानवमात्र का कल्याण और उन्नति छुपी है ।

अमेरिकन इतिहास में पहली बार भारतीय हिन्दू संत की धूम

अमेरिकन इतिहास में पहली बार भारतीय हिन्दू संत की धूम..

कैलिफोर्निया:- सैन जोस जिला शिक्षा विभाग (बेरीएस्सा यूनियन स्कूल डिस्ट्रिक्ट) #कैलिफोर्निया ने इस वर्ष हिन्दू संत आशारामजी बापू द्वारा प्रेरित तथा श्री योग वेदान्त सेवा समिति द्वारा आयोजित “मातृ-पितृ पूजन दिवस” के प्रचार की ना केवल अनुमति दी बल्कि इसके प्रचार पर अधिकारिक मोहर भी लगाई।

प्रधान टाइम मीडिया प्रभारी #नीलू अरोड़ा ने जानकारी देते हुये बताया कि शिक्षकों के सहयोग से हिन्दू संत आसारामजी बापू के श्री चित्र वाला “#मातृ-पितृ पूजन दिवस” का पोस्टर जिले के 11 से अधिक विद्यालयों के हजारों अमेरिकन बच्चों तथा अभिभावकों तक पहुँचा।

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स्वयं प्राचार्यों ने अभिभावकों को पोस्टर सहित ईमेल भेजे। #विद्यालयों के #नोटिस बोर्ड तथा कक्षाओं में भी बच्चों को कार्यक्रम के बारे में बताया गया व घर ले जाने के लिए फ्लायर भी दिये गये। इसके अतिरिक्त सैन #जोस लाइब्रेरी के कर्मचारियों ने भी लाइब्रेरी के बाहर तथा वेबसाइट पर “मातृ-पितृ पूजन दिवस” का पोस्टर लगाकर इसका प्रचार किया।

पब्लिक लाइब्रेरी की #वेबसाइट पर इवेंट का लिंक:

सिएरामोंट मिडल स्कूल के प्राचार्य द्वारा शिक्षा विभाग से अनुमोदन की #स्टैम्पवाला पोस्टर व ईमेल 1200 बच्चों के अभिभावकों को भेजा गया।

साथ ही लेनव्यू #एलीमेंट्री स्कूल के हर बच्चे को “मातृ-पितृ पूजन दिवस”  का फ्लायर दिया गया।

इस स्कूल में बच्चों की संख्या 600 है। कई अन्य स्कूलों में जैसे रस्किन एलीमेंट्री स्कूल, मोर्रील्ल मिडल स्कूल, मेजेस्टिक वे एलीमेंट्री स्कूल, विंन्सी #एलीमेंट्री स्कूल, नोबल एलीमेंट्री स्कूल, टोयोन #एलीमेंट्री स्कूल में भी “#मातृ-पितृ पूजन दिवस” के कार्यक्रम की जानकारी स्कूल द्वारा पोस्टर लगा कर, शिक्षकों द्वारा बच्चों को बताकर तथा फ्लायर बांटकर दी गयी। पीडमोंट #हाईस्कूल में भी पोस्टर दिए गये जबकि यह स्कूल दूसरे जिले में आता है फिर भी उन्होंने आपत्ति नहीं की।

उल्लेखनीय है कि भारत के विभिन्न स्कूलों में भी जनवरी-फरवरी-मार्च-अप्रैल माह से “मातृ-पितृ पूजन दिवस” #कार्यक्रम मनाया जाता रहा है जिसमें सभी धर्मों के #माता-पिता व बच्चे सम्मिलित होते रहे हैं।  इस पर्व से माता-पिता तथा बच्चों के बीच की दूरियाँ खत्म हुई हैं और सभी बच्चों व माता-पिताओं की यह हार्दिक इच्छा रही कि हर साल इसी तरह से स्कूलों में यह दिवस मनाया जाता रहे ताकि इन सुसंस्कारों से भारत अपने प्राचीन गौरव को पुन: प्राप्त कर सके।

गौरतलब है कि हिन्दू संत #आसारामजी बापू ने 2006 से 14 फरवरी #वेलेंटाइन डे की जगह “मातृ-पितृ पूजन” शुरू किया था तबसे लेकर आज तक करोड़ो #विद्यार्थी इस दिन माता-पिता का पूजन करते हैं और माता-पिता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं ।

हिन्दू संत आसारामजी बापू जेल जाने के पीछे का कारण?

जबसे हिन्दू संत #आसारामजी बापू ने मातृ-पितृ पूजन शुरू किया है तबसे विदेशी कम्पनियों को अरबो-खरबों का लॉस हो रहा था क्योंकि उनके बड़े-बड़े गिफ्ट,गर्भ निरोधक सामग्री, #दवाइयां एवं #चॉकलेट आदि सामग्री बिकना बन्द हो गई थी।

आपको बता दें कि संत आसारामजी बापू के प्रवचन करीब 200 देशों में लोग सुनते थे,जिसमें वे उत्तम #स्वास्थ्य के लिए ध्यान, #प्राणयाम,योग और घरेलू उपचार करने के सरल उपाय बताते थे और साथ-साथ में अंग्रेजी दवाइयों के साइड इफेक्ट भी बताते थे जिससे करोड़ो लोग अंग्रेजी #दवाइयां छोड़कर उनके बताए उपायों से ठीक होने लगे थे ।

दूसरा कार्य – उन्होंने करोड़ो लोगों को #व्यसन मुक्त कराया । बीड़ी, सिगरेट, दारू बनाने वाली कंपनियों को अरबो का लॉस हुआ ।

तीसरा कार्य – उन्होंने युवाओं को #ब्रह्मचर्य का पाठ पढ़ाया,संयमी और सदाचारी जीवन जीने की शिक्षा दी। जिससे युवाओं ने फिल्म देखना, क्लबों में जाना बंद कर दिया । सेक्स सामग्री बनाने वाली कंपनियों व बॉलिवुड और क्लबो आदि को कई करोड़ों का नुकसान होने लगा ।

चौथा कार्य – उन्होंने देश भर में हजारों #बाल संस्कार के साथ साथ #गुरुकुल शिक्षा पद्धति शुरू करवाई । जिससे बचपन से ही बच्चों में #नैतिकता के संस्कार पनपने लगे । इस समय में भी उनके आश्रम द्वारा 17 हजार से ज्यादा बाल संस्कार केन्द्र और सैकड़ों #गुरुकुल चल रहे हैं । इससे ईसाईयों द्वारा संचालित कान्वेंट स्कूलों पर गहरा प्रभाव पड़ा ।

पांचवा कार्य – उन्होंने गांव-गांव जाकर हिंदुत्व का प्रचार किया और #आदिवासी इलाकों में जाकर मकान बनवाये, #भजन करो भोजन पाओ,दक्षिणा पाओ जैसी अनेकों योजनाओं द्वारा लाखों हिंदुओं की #घरवापसी कराई जिससे धर्मान्तरण वालों के लिए संत आसारामजी बापू बाधक बनें।

बापू आसारामजी के 8 करोड़ से अधिक भक्तों संयम सदाचार रहने और #व्यशन छोड़ने पर इन सबसे विदेशी कंपनियों को करोड़ों अरबों का नुकसान होने लगा और #ईसाई #मिशनरियों के धर्मान्तरण कार्य में आँख की किकरी बन खड़े हुए संत आसारामजी बापू ।

तो शुरू हुआ 2007 से #संत आसारामजी बापू के विरुद्ध षड़यंत्र जिसमें पूर्व सरकार का भी रहा बड़ा हाथ। जो वेटिकन सिटी के इशारे पर सोनिया गांधी ने काम किया ।

पर जब किसी #षड़यंत्र में षड्यंत्रकारी सफल नहीं हुए तो एक लड़की को मोहरा बना एक घिनौने #षड़यंत्र में फंसाया गया निर्दोष #संत को और उनकी छवि धूमिल करने का काम किया विदेशी फण्ड से चलने वाली भारतीय मीडिया ने ।

जग जाहिर है कि आज तक उनके खिलाफ एक भी सबूत नहीं मिल पाया है पर उनको #फंसाने के #सैकड़ों प्रमाण मिल चुके हैं । पर हमारे देश का कानून जो आतंकवादी के साथ भी उदारता का व्यवहार रखता है जो बड़े से बड़े दोषी को भी जमानत और पेरोल देता है वो 81 वर्षीय संत को उनके #मौलिक अधिकार जमानत तक से क्यों वंचित रखे हुए है ?

विचार कीजिये !!

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माँ गंगा के पौराणिक इतिहास एवं महत्ता

माँ गंगा जयंती : 2 मई
पौराणिक
कथा के अनुसार राजा सगर ने #तपस्या करके साठ हजार पुत्रों की प्राप्ति की।
एक दिन राजा #सगर ने देवलोक पर विजय प्राप्त करने के लिये एक #यज्ञ किया।
यज्ञ के लिये #घोड़ा आवश्यक था जो #ईर्ष्यालु इंद्र ने चुरा लिया था।
Ganga Jayanti
सगर
ने अपने सारे पुत्रों को घोड़े की खोज में भेज दिया अंत में उन्हें घोड़ा
#पाताल लोक में मिला जो एक #ऋषि के समीप बँधा था। सगर के पुत्रों ने यह सोच
कर कि ऋषि ही घोड़े के #गायब होने की वजह हैं उन्होंने ऋषि का अपमान किया।
तपस्या में #लीन ऋषि ने हजारों वर्ष बाद अपनी आँखें खोली और उनके क्रोध से
सगर के सभी साठ हजार पुत्र जल कर वहीं #भस्म हो गये।
सगर
के पुत्रों की #आत्माएँ भूत बनकर विचरने लगीं क्योंकि उनका #अंतिम संस्कार
नहीं किया गया था। सगर के पुत्र #अंशुमान ने आत्माओं की मुक्ति का #असफल
प्रयास किया और बाद में अंशुमान के पुत्र #दिलीप ने भी।
भगीरथ
राजा दिलीप की #दूसरी पत्नी के पुत्र थे। उन्होंने अपने #पूर्वजों का
अंतिम संस्कार किया। उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रण किया जिससे
उनके #अंतिम संस्कार कर, राख को गंगाजल में #प्रवाहित किया जा सके और भटकती
आत्माएं #स्वर्ग में जा सकें। भगीरथ राजा ने ब्रह्मा की घोर तपस्या की
ताकि गंगा को #पृथ्वी पर लाया जा सके। ब्रह्मा प्रसन्न हुये और गंगा को
पृथ्वी पर भेजने के लिये तैयार हुये और गंगा को पृथ्वी पर और उसके बाद
#पाताल में जाने का आदेश दिया ताकि सगर के पुत्रों की आत्माओं की मुक्ति
संभव हो सके।
तब
गंगा ने कहा कि मैं इतनी ऊँचाई से जब पृथ्वी पर #गिरूँगी, तो पृथ्वी इतना
#वेग कैसे सह पाएगी? तब भगीरथ ने भगवान ₹शिव से निवेदन किया और उन्होंने
अपनी खुली #जटाओं में गंगा के वेग को रोक कर, एक लट खोल दी, जिससे गंगा की
अविरल धारा पृथ्वी पर प्रवाहित हुई। वह धारा भगीरथ के पीछे-पीछे गंगा सागर
#संगम तक गई, जहाँ सगर-पुत्रों का #उद्धार हुआ। शिव के स्पर्श से गंगा और
भी पावन हो गयी और पृथ्वी #वासियों के लिये बहुत ही श्रद्धा का केन्द्र बन
गयीं।
भारत
की सबसे #महत्वपूर्ण नदी गंगा जो भारत और बांग्लादेश में मिलाकर 2,510
किमी की दूरी तय करती हुई #उत्तराखंड में हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी के
#सुंदरवन तक विशाल भू भाग को सींचती है, देश की प्राकृतिक संपदा ही नही,
जन जन की #भावनात्मक आस्था का आधार भी है। 2,071 कि.मी तक भारत तथा उसके
बाद बांग्लादेश में अपनी लंबी यात्रा करते हुए यह सहायक नदियों के साथ दस
लाख वर्ग किलोमीटर #क्षेत्रफल के अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है।
सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से #अत्यंत महत्वपूर्ण
गंगा का यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है। 100 फीट (31
मी) की अधिकतम गहराई वाली यह नदी भारत में #पवित्र मानी जाती है तथा इसकी
#उपासना माँ और देवी के रूप में की जाती है। #भारतीय पुराण और साहित्य में
अपने #सौंदर्य और महत्व के कारण बार-बार आदर के साथ #वंदित गंगा नदी के
प्रति विदेशी साहित्य में भी #
प्रशंसा और भावुकतापूर्ण वर्णन किए गए हैं।
गंगा नदी पर बने पुल, बाँध और नदी #परियोजनाएँ भारत की बिजली, पानी और कृषि से संबन्धित जरुरतों को पूरा करती हैं।
भागीरथी नदी गंगोत्री में
गंगा
नदी की #प्रधान शाखा भागीरथी है जो #कुमायूँ में हिमालय के गोमुख नामक
स्थान पर #गंगोत्री हिमनद से निकलती है।  गंगा के इस उद्गम स्थल की #ऊँचाई
3140 मीटर है। यहाँ गंगा जी को समर्पित एक #मंदिर भी है।
गंगोत्री
तीर्थ, शहर से 19 कि.मी. उत्तर की ओर 3892 मी.(12,770 फी.) की ऊँचाई पर इस
#हिमनद का मुख है। यह हिमनद 25 कि.मी. लंबा व 4 कि.मी. चौड़ा और लगभग 40
मी. ऊँचा है। इसी #ग्लेशियर से भागीरथी एक छोटे से #गुफानुमा मुख पर अवतरित
होती है। इसका जल #स्रोत 5000 मी. ऊँचाई पर स्थित एक बेसिन है। इस #बेसिन
का मूल पश्चिमी ढलान की संतोपंथ की चोटियों में है। गौमुख के रास्ते में
3600 मी. ऊँचे चिरबासा ग्राम से विशाल #गोमुख हिमनद के दर्शन होते हैं। इस
हिमनद में नंदा देवी, कामत पर्वत एवं त्रिशूल पर्वत का हिम #पिघल कर आता
है। यद्यपि गंगा के आकार लेने में अनेक छोटी #धाराओं का योगदान है लेकिन 6
बड़ी और उनकी सहायक 5 छोटी धाराओं का भौगोलिक और सांस्कृतिक महत्व अधिक
है।
अलकनंदा
की सहायक नदी धौली, विष्णु गंगा तथा मंदाकिनी है। धौली गंगा का अलकनंदा से
#विष्णु प्रयाग में संगम होता है। यह 1372 मी. की ऊँचाई पर स्थित है। फिर
2805 मी. ऊँचे नंद प्रयाग में #अलकनन्दा का #नंदाकिनी नदी से संगम होता है।
इसके बाद कर्ण प्रयाग में अलकनन्दा का कर्ण गंगा या पिंडर नदी से #संगम
होता है।
फिर
#ऋषिकेश से 139 कि.मी. दूर स्थित रुद्र प्रयाग में अलकनंदा मंदाकिनी से
मिलती है। इसके बाद भागीरथी व अलकनन्दा 1500 फीट पर स्थित #देव प्रयाग में
संगम करती हैं यहाँ से यह सम्मलित जल-धारा गंगा नदी के नाम से आगे प्रवाहित
होती है। इन पांच प्रयागों को सम्मलित रूप से #पंच प्रयाग कहा जाता है।इस
प्रकार 200 कि.मी. का #संकरा पहाड़ी रास्ता तय करके गंगा नदी ऋषिकेश होते
हुए प्रथम बार मैदानों का #स्पर्श हरिद्वार में करती है।
त्रिवेणी-संगम, प्रयाग
हरिद्वार
से लगभग 800 कि.मी. #मैदानी यात्रा करते हुए गढ़मुक्तेश्वर, सोरों,
फर्रुखाबाद, कन्नौज, बिठूर, कानपुर होते हुए गंगा #इलाहाबाद (प्रयाग)
पहुँचती है। यहाँ इसका संगम #यमुना नदी से होता है। यह संगम स्थल हिन्दुओं
का एक महत्वपूर्ण तीर्थ है। इसे तीर्थराज प्रयाग कहा जाता है। इसके बाद
हिन्दू धर्म की प्रमुख #मोक्षदायिनी नगरी काशी (वाराणसी) में गंगा एक वक्र
लेती है, जिससे यह यहाँ #उत्तरवाहिनी कहलाती है। यहाँ से मीरजापुर, पटना,
भागलपुर होते हुए पाकुर पहुँचती है। इस बीच इसमें बहुत-सी सहायक #नदियाँ,
जैसे सोन, गंडक, घाघरा, कोसी आदि मिल जाती हैं। भागलपुर में #राजमहल की
पहाड़ियों से यह दक्षिणवर्ती होती है। पश्चिम बंगाल के #मुर्शिदाबाद जिले
के गिरिया स्थान के पास गंगा नदी दो शाखाओं में #विभाजित हो जाती
है-भागीरथी और पद्मा। भागीरथी नदी गिरिया से दक्षिण की ओर बहने लगती है
जबकि पद्मा नदी दक्षिण-पूर्व की ओर बहती #फरक्का बैराज (1974 निर्मित) से
छनते हुई बंगला देश में प्रवेश करती है। यहाँ से गंगा का #डेल्टाई भाग शुरू
हो जाता है। मुर्शिदाबाद शहर से #हुगली शहर तक गंगा का नाम भागीरथी नदी
तथा हुगली शहर से मुहाने तक गंगा का नाम #हुगली नदी है। गंगा का यह मैदान
मूलत: एक भू-अभिनति गर्त है जिसका निर्माण मुख्य रूप से हिमालय #पर्वतमाला
निर्माण प्रक्रिया के तीसरे चरण में लगभग 3-4 #करोड़ वर्ष पहले हुआ था। तब
से इसे #हिमालय और प्रायद्वीप से निकलने वाली नदियाँ अपने साथ लाये हुए
अवसादों से पाट रही हैं। इन मैदानों में #जलोढ़ की औसत गहराई 1000 से 2000
मीटर है। इस मैदान में नदी की #प्रौढ़ावस्था में बनने वाली अपरदनी और
निक्षेपण स्थलाकॄतियाँ, जैसे- बालू-रोधका, विसर्प, गोखुर झीलें और गुंफित
नदियाँ पाई जाती हैं।
गंगा
की इस #घाटी में एक ऐसी सभ्यता का उद्भव और विकास हुआ जिसका #प्राचीन
इतिहास अत्यन्त गौरवमयी और #वैभवशाली है। जहाँ ज्ञान, धर्म, अध्यात्म व
सभ्यता-संस्कृति की ऐसी किरण प्रस्फुटित हुई जिससे न केवल भारत बल्कि समस्त
#संसार आलोकित हुआ।
पाषाण
या #प्रस्तर युग का जन्म और विकास यहाँ होने के अनेक #साक्ष्य मिले हैं।
इसी घाटी में #रामायण और महाभारत कालीन युग का उद्भव और विलय हुआ। शतपथ
ब्राह्मण, पंचविश ब्राह्मण, गौपथ ब्राह्मण, ऐतरेय आरण्यक, कौशितकी आरण्यक,
सांख्यायन आरण्यक, वाजसनेयी संहिता और #महाभारत इत्यादि में वर्णित घटनाओं
से #उत्तर वैदिककालीन गंगा घाटी की जानकारी मिलती है। प्राचीन मगध महाजनपद
का उद्भव गंगा घाटी में ही हुआ जहाँ से #गणराज्यों की परंपरा विश्व में
पहली बार प्रारंभ हुई। यहीं भारत का वह स्वर्ण युग विकसित हुआ जब मौर्य और
गुप्त वंशीय राजाओं ने यहाँ #शासन किया।
सुंदरवन-विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा-गंगा का #मुहाना-बंगाल की खाड़ी में है ।
हुगली
नदी कोलकाता, हावड़ा होते हुए #सुंदरवन के भारतीय भाग में सागर से #संगम
करती है। #पद्मा में ब्रह्मपुत्र से निकली शाखा नदी जमुना नदी एवं मेघना
नदी मिलती हैं। अंततः ये 350 कि.मी. चौड़े सुंदरवन डेल्टा में जाकर #बंगाल
की खाड़ी में सागर-संगम करती है। यह #डेल्टा गंगा एवं उसकी सहायक नदियों
द्वारा लाई गई नवीन #जलोढ़ से 1,000 वर्षों में निर्मित समतल एवं निम्न
मैदान है। यहाँ #गंगा और बंगाल की खाड़ी के संगम पर एक प्रसिद्ध हिन्दू
तीर्थ है जिसे #गंगा-सागर-संगम कहते हैं।
गोमुख पर शुद्ध गंगा
गंगा
नदी विश्व भर में अपनी #शुद्धीकरण क्षमता के कारण जानी जाती है। लंबे समय
से प्रचलित इसकी शुद्धीकरण की मान्यता का #वैज्ञानिक आधार भी है। वैज्ञानिक
मानते हैं कि इस नदी के जल में #बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं, जो
जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। नदी
के जल में #प्राणवायु (ऑक्सीजन) की मात्रा को बनाए रखने की #असाधारण क्षमता
है। किंतु इसका कारण अभी तक अज्ञात है। एक राष्ट्रीय सार्वजनिक #रेडियो
कार्यक्रम के अनुसार इस कारण हैजा और पेचिश जैसी #बीमारियाँ होने का खतरा
बहुत ही कम हो जाता है, जिससे #महामारियाँ होने की संभावना बड़े स्तर पर टल
जाती है।
लेकिन
गंगा के तट पर घने बसे #औद्योगिक नगरों के #नालों की गंदगी सीधे गंगा नदी
में मिलने से गंगा का प्रदूषण पिछले कई सालों से #चिंता का विषय बना हुआ
है। औद्योगिक कचरे के साथ-साथ #प्लास्टिक कचरे की #बहुतायत ने गंगा जल को
भी बेहद प्रदूषित किया है।
वैज्ञानिक जांच के अनुसार गंगा का #बायोलाजिकल ऑक्सीजन स्तर 3 डिग्री (सामान्य) से बढ़कर 6 डिग्री हो चुका है।
गंगा
में 2 करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा #प्रतिदिन गिर रहा है।  यह घोर
#चिन्तनीय है कि कब गंगा-जल की सफाई पूर्ण होगी । गंगा नदी की सफाई के लिए
कई बार पहल की गयी लेकिन कोई भी #संतोषजनक स्थिति तक नहीं पहुँच पाया।
वाराणसी घाट
भारत
की अनेक #धार्मिक अवधारणाओं में गंगा नदी को देवी के रूप में निरुपित किया
गया है। बहुत से पवित्र #तीर्थस्थल गंगा नदी के किनारे पर बसे हुये हैं ।
जिनमें वाराणसी और #हरिद्वार सबसे प्रमुख हैं। गंगा नदी को भारत की पवित्र
नदियों में सबसे पवित्र माना जाता है एवं  गंगा में स्नान करने से मनुष्य
के सारे #पापों का नाश हो जाता है । गंगाजल को पवित्र समझा जाता है तथा
समस्त #संस्कारों में उसका होना आवश्यक है। पंचामृत में भी गंगाजल को एक
#अमृत माना गया है।
महाभारत
के अनुसार मात्र प्रयाग में माघ मास में #गंगा-यमुना के संगम पर तीन करोड़
दस हजार तीर्थों का संगम होता है। ये तीर्थ स्थल सम्पूर्ण भारत में
#सांस्कृतिक एकता स्थापित करते हैं।
माँ गंगा की अपार महिमा
भारत
की राष्ट्र-नदी गंगा जल ही नहीं, अपितु भारत और #हिंदी साहित्य की #मानवीय
चेतना को भी प्रवाहित करती है। ऋग्वेद, महाभारत, रामायण एवं अनेक पुराणों
में #गंगा को पुण्य सलिला, पाप-नाशिनी, मोक्ष प्रदायिनी, सरित्श्रेष्ठा एवं
महानदी कहा गया है।
जैसे
मंत्रों में #ॐकार, स्त्रियों में #गौरीदेवी, तत्वों में #गुरुतत्व और
विद्याओं में #आत्मविद्या उत्तम है, उसी प्रकार सम्पूर्ण तीर्थों में
#गंगातीर्थ विशेष माना गया है । गंगाजी की वंदना करते हुए कहा गया है :
संसारविषनाशिन्यै जीवनायै नमोऽस्तु ते । तापत्रितयसंहन्त्र्यै प्राणेश्यै ते नमो नमः ।।
‘देवी
गंगे ! आप संसाररूपी विष का नाश करनेवाली हैं । आप जीवनरूपा हैं । आप
आधिभौतिक,आधिदैविक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार के तापों का संहार करनेवाली
तथा प्राणों की स्वामिनी हैं । आपको बार-बार नमस्कार है ।’
(स्कंद पुराण, काशी खं. पू. : 27.160)
जिस
दिन #गंगाजी की उत्पत्ति हुई वह दिन ‘गंगा जयंती’ (वैशाख शुक्ल सप्तमी – 2
मई) और जिस दिन गंगाजी पृथ्वी पर #अवतरित हुईं वह दिन ‘गंगा दशहरा’
(ज्येष्ठ शुक्ल दशमी – 4 जून) के नाम से जाना जाता है । इन दिनों में
गंगाजी में #गोता मारने से विशेष #सात्विकता, प्रसन्नता और पुण्यलाभ होता
है । वैशाख, कार्तिक और माघ मास की पूर्णिमा, माघ मास की #अमावस्या तथा
#कृष्णपक्षीय अष्टमी तिथि को गंगास्नान करने से भी विशेष #पुण्यलाभ होता है
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गौहत्या पर ड़ॉ.सुब्रमण्यम स्वामी ने बीबीसी को दिया करारा जवाब…

🚩गौहत्या पर ड़ॉ.सुब्रमण्यम स्वामी ने बीबीसी को दिया करारा जवाब…
🚩वरिष्ठ
नेता बीजेपी ड़ॉ.सुब्रमण्यम स्वामी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि भारत
के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गाँधी ने कहा था कि अगर हमारे पास
सत्ता आएगी तो मैं गोरक्षा के लिए काम करते हुए गोहत्या पर प्रतिबंध लगा
दूँगा ।
🚩 #महात्मा_गाँधी ने साफ कहा था कि उनके लिए गाय का कल्याण अपनी आजादी से भी प्रिय है।
Dr Subramaniam Swamy, Retort, slaughter, BBC,
🚩देश
में गोरक्षा की परम्परा हजारों साल से चली आ रही है और जब बहादुर शाह जफर
को 1857 में दोबारा #दिल्ली की गद्दी पर बैठाया गया तो उनका पहला कदम था
गोहत्या पर प्रतिबंध ।
🚩जब
भारत का संविधान बना तो राज्य के नीति-निर्देशक तत्व बने, जिनमें कहा गया
है कि सरकार को गोरक्षा करने और गोहत्या रोकने की तरफ कदम उठाने चाहिए ।
🚩हम
पर ये आरोप लगता है कि हमने #हिंदुत्व के नाम पर इसे मुद्दा बनाया है जो
सरासर गलत है, क्योंकि ये एक प्राचीन भारतीय परम्परा रही है ।
🚩सुप्रीम कोर्ट
🚩प्राचीन
काल में सिर्फ गाय के लिए ही नहीं बल्कि मोर की रक्षा की भी परंपरा रही है
और भारत में #मोर की हत्या पर 1951 में प्रतिबंध लगाने के अलावा उसे
#राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया ।
🚩मोर की #हत्या करने पर सात साल के कारावास की सजा का भी प्रावधान है ।
🚩भारत में गोरक्षा को सिर्फ धार्मिक दृष्टि से देखना भी गलत है और इसके दूसरे फायदे नजर अन्दाज नहीं किए जाने चाहिए ।
🚩हमारे यहाँ ‘बॉस इंडिकस’ नामक गाय की नस्ल है और ये सर्वमान्य है कि उसके दूध में जो पोषक तत्व है, वो दूसरी नस्लों में नहीं है ।
🚩1958
में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर गोहत्या पर प्रतिबन्ध लगाएं तो इससे
इस्लामिक संप्रदाय को ठेस नही पहुँचनी चाहिए क्योंकि #इस्लाम में गोमाँस
खाना अनिवार्य नही है ।
🚩आरएसएस प्रमुख और मेरी भी माँग यही है कि भारत में #गोहत्या पर प्रतिबंध लगना चाहिए ।
🚩मेरी
अपनी माँग है कि गोहत्या करने वालों को मृत्युदंड दिया जाना चाहिए और संसद
में मेरे #प्राइवेट मेंबर्स बिल प्रस्तुत करने के बाद कई राज्यों ने इसकी
सजा को आजीवन कारावास कर दिया है ।
🚩मेरे
बिल में इस बात का भी सुझाव है कि जब गाय #दूध देना बंद कर दे तो कैसे
उन्हें गोशालाओं में शिफ्ट किया जाए और इसके लिए एक नैशनल #ऑथॉरिटी का गठन
होना चाहिए।
🚩जामनगर से गुवाहाटी
🚩रहा
सवाल उन इतिहासकारों या विशेषज्ञो का जो अपनी रिसर्च के आधार पर दावा करते
हैं कि प्राचीन काल और मध्य काल में भारत में गोमाँस खाया जाता था, तो ये
लोग आर्यन शब्द का प्रयोग करने वाले अंग्रेजों के पिट्ठू हैं ।
🚩ताजा जेनेटिक या #डीएनए शोध के अनुसार कश्मीर से कन्याकुमारी और जामनगर से गुवाहाटी तक सारे #हिन्दुस्तानियों का डीएनए एक ही है ।
🚩हिंदू-मुसलमान का डीएनए भी एक है इसलिए सभी #मुसलमानों के पूर्वज हिंदू हैं ।
🚩इतिहासकारों ने #आर्यन्स और द्रविडियन्स का जो बँटवारा किया मैं उसे नहीं मानता।
🚩किसी भी #ग्रन्थ में इस बात का उल्लेख नहीं मिलता जिससे गोमाँस खाने के प्रमाण मिले या किसी तरह की अनुमति के प्रमाण मिलें ।
🚩मूलभूत अधिकार
🚩एक
और सवाल #उठता है कि हर नागरिक का एक मूलभूत अधिकार होता है अपनी पसंद का,
यानी जो पसंद होगा वो खाने का और इसे कोई छीन नहीं सकता ।
🚩लेकिन भारत के संविधान में ऐसा नहीं और हर मूलभूत अधिकार पर एक #न्यायपूर्ण अंकुश लग सकता है ।
🚩कल कोई कहेगा कि मैं अफीम खाऊँगा या कोकीन लूँगा, तो ऐसा नही हो सकता ।
🚩रहा
सवाल एकमत होने का तो भारत में लगभग 80% #हिंदू हैं जिसमें से 99% गोहत्या
के पक्ष में नहीं बोलेंगे तो अलग राय होने का सवाल ही नही।
🚩बात
अगर #माइनॉरिटी राइट्स या अल्पसंख्यक समुदाय के हितों की रक्षा की है तो
फिर ये आपको दिखाना होगा कि गोमाँस खाना उनके लिए अनिवार्य है ।
🚩जबकि #सुप्रीम कोर्ट ये कह चुका है कि ये अनिवार्य नही ।
🚩और ये कहना कि सिर्फ #मुसलमानों में कथित गोरक्षा मुहिम से संशय है तो ये बात गलत है।
🚩कई
#हिंदू भी #गोहत्या करके निर्यात करते थे क्योंकि सब्सिडीज मिलती थी और
कारोबार बढ़ता था बूचड़खाने खोलने से । उन्हें भी नुकसान होगा ।
🚩भगवान
राम के अवतार से पहले सतयुग से ही गाय को माता के तरीके से पालन किया गया
है और भगवान श्री कृष्ण तो स्वयं #गाय माता को चराने जाते है उसके रहने
मात्र से वातावरण पवित्र हो जाता है उसके #दूध, घी, दही, गौमूत्र, गोबर का
उपयोग करके जीवन मे व्यक्ति स्वस्थ रह सकता है , जीवित गाय करोड़ो की कमाई
करके देती है ऐसी पवित्र जीवन उपयोगी गौहत्या करना कहाँ तक उचित है?
🚩और ऐसी पवित्र गाय की रक्षा करने वालों को #प्रोत्साहित करना तो दूर रहा पर उनको गुंडा बोला जाता है जो कितना #शर्मनाक है ।
🚩गाय का पालन करना ही #मनुष्य मात्र के लिए उपयोगी है और गौहत्या करना विनाश का कारण है ।