देववाणी संस्कृत से आई है मुसलमानों की ‘नमाज

देववाणी संस्कृत से आई है मुसलमानों की ‘नमाज
जून 26,2017
संसार
की समस्त प्राचीनतम भाषाओं में संस्कृत का सर्वोच्च स्थान है।
विश्व-साहित्य की प्रथम पुस्तक ऋग्वेद संस्कृत में ही रची गई है। संपूर्ण
भारतीय संस्कृति, परंपरा और महत्वपूर्ण राज इसमें निहित हैं । अमरभाषा या
देववाणी संस्कृत को जाने बिना भारतीय संस्कृति की महत्ता को जाना नहीं जा
सकता।
namaaz
संस्कृत भाषा से ही सभी भाषाओं की उत्पत्ति हुई है। दूसरे शब्दों में इसे भाषाओं की माँ माना गया है।
प्राचीन
काल से ही जनमानस से लेकर साहित्य की भाषा रही संस्कृत, कालांतर में
करीब-करीब सुस्ता कर बैठ गई, जिसका एक मुख्य कारण है कि इसका समाज में
महत्व न समझकर केवल पूजाघर में ही स्थापित कर दिया गया।
देववाणी संस्कृत भाषा तो जिस संस्कृति और परिवेश में जाती है, उसे अपना कुछ न कुछ देकर ही आती है।
वैदिक
संस्कृत जिस बेलागपन से समाज के क्रिया-कलापों को परिभाषित करती थी उतने
ही अपनेपन के साथ दूरदराज के समाजों में भी उसका उठना बैठना था। जिस जगह
विचरती उस स्थान का नामकरण कर देती।
दजला और फरात के
भूभाग से गुजरी तो उस स्थान का नामकरण ही कर दिया । हरे भरे खुशहाल शहर को
‘भगवान प्रदत्त’ कह डाला। संस्कृत का भगः शब्द फारसी अवेस्ता में “बग” हो
गया और दत्त हो गया “दाद” और बन गया बगदाद।
अफगान का अश्वक से नाता
इसी
प्रकार संस्कृत का “अश्वक” प्राकृत में बदला “आवगन” और फारसी में पल्टी
मारकर “अफगान” हो गया और साथ में स्थान का प्रत्यय “स्तान” में बदलकर मिला
दिया और बना दिया हिंद का पड़ोसी अफगानिस्तान -यानी निपुण घुड़सवारों की
निवास-स्थली।
स्थान ही
नहीं, संस्कृत तो किसी के भी पूजाघरों में जाने से नहीं कतराती क्योंकि वह
तो यह मानती है कि ईश्वर का एक नाम अक्षर भी तो है। अ-क्षर यानी जिसका
क्षरण न होता हो।
इस्लाम
की पूजा पद्धति का नाम यूँ तो कुरान में सलात है लेकिन मुसलमान इसे नमाज के
नाम से जानते और अदा भी करते हैं। नमाज शब्द संस्कृत धातु नमस् से बना है।
इसका
पहला उपयोग ऋगवेद में हुआ है और अर्थ होता है- आदर और भक्ति में झुक जाना।
श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय के इस श्लोक को देखें – नमो
नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते।
इस
संस्कृत शब्द नमस् की यात्रा भारत से होती हुई ईरान पहुंची जहाँ प्राचीन
फारसी अवेस्ता उसे नमाज पुकारने लगी और आखिरकार तुर्की, आजरबैजान,
तुर्केमानिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान,
पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश, बर्मा, इंडोनेशिया और मलेशिया के मुसलामानों
के दिलों में घर कर गई।
देववाणी
संस्कृत ने पछुवा हवा बनकर पश्चिम का ही रुख नहीं किया बल्कि यह पुरवाई
बनकर भी बही ।  चीनियों को “मौन” शब्द देकर उनके अंतस को भी “छू” गई।
चीनी भाषा में ध्यानमग्न खामोशी को मौन कहा जाता है और स्पर्श को छू कहकर पुकारा जाता है।
देश-विदेश
के कई बड़े विद्वान संस्कृत के अनुपम और विपुल साहित्य को देखकर चकित रह
गए हैं। कई विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक रीति से इसका अध्ययन किया और गहरी
गवेषणा की है। समस्त भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाली कड़ी यदि कोई भाषा है तो
वह संस्कृत ही है।
स्वामी #विवेकानंदजी के शब्द हैं : ‘#संस्कृत शब्दों की ध्वनिमात्र से इस जाति को शक्ति, बल और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है ।’
#संस्कृत-ज्ञान
से प्रभावित #विलियम_थियॉडोर का कहना है कि ‘#भारत तथा संसार का उद्धार और
सुरक्षा #संस्कृत-ज्ञान के द्वारा ही संभव है ।’
संस्कृत
की भाषा विशिष्टता को समझकर Saint James Independent school नामक लन्दन के
बीच बनी एक पाठशाला ने अपने जूनियर डिविजन में इसकी शिक्षा को अनिवार्य
बना दिया है।
#Oxford_University
के डॉक्टर जोसफ अनुसार संस्कृत विश्व की सर्वाधिक पूर्ण, परिमार्जित एवं
तर्कसंगत भाषा है। यह एकमात्र ऐसी भाषा है जिसका नाम उसे बोलने वालों के
नाम पर आधारित नहीं है। वरन संस्कृत शब्द का अर्थ ही है “पूर्ण भाषा”।
न्यूजीलैंड
के शहर #अॉकलैंड के माउंट इडेन क्षेत्र में स्थित इस पाठशाला में संस्कृत
भाषा ही पढ़ाई जाती है वहाँ के प्रिंसिपल पीटर क्राम्पटन कहते हैं कि,
दुनियाँ की कोई भी भाषा सीखने के लिए #संस्कृत भाषा आधार का काम करती है।
संस्कृत
का अध्ययन मनुष्य को सूक्ष्म विचारशक्ति प्रदान करता है । मन स्वाभाविक ही
अंतर्मुख होने लगता है । इसका अध्ययन मौलिक चिंतन को जन्म देता है ।
#संस्कृत भाषा के पहले की कोई अन्य भाषा, संस्कृत वर्णमाला के पहले की कोई
अन्य वर्णमाला देखने-सुनने में नहीं आती । इसका व्याकरण भी अद्भुत है । ऐसा
सर्वांगपूर्ण व्याकरण जगत की किसी भी अन्य भाषा में देखने में नहीं आता ।
यह संसार भर की भाषाओं में #प्राचीनतम और समृद्धतम है ।
आज
#आवश्यकता है संस्कृत के विभिन्न आयामों पर फिर से नवीन ढंग से अनुसन्धान
करने की, इसके प्रति जनमानस में जागृति लाने की; क्योंकि संस्कृत हमारी
संस्कृति का प्रतीक है। संस्कृति की रक्षा एवं विकास के लिए संस्कृत को
महत्त्व प्रदान करना आवश्यक है। इस विरासत को हमें पुनः शिरोधार्य करना
होगा तभी इसका विकास एवं उत्थान संभव है।
भारतीय
संस्कृति की सुरक्षा, चरित्रवान नागरिकों के निर्माण, प्राचीन
ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ति एवं विश्वशांति हेतु संस्कृत का अध्ययन अवश्य
होना चाहिए ।
अमेरिका के
नेता राजन झेद ने कहा है कि, संस्कृत को सही स्थान दिलाने की आवश्यकता है।
एक ओर तो सम्पूर्ण विश्व में संस्कृत भाषा का महत्व बढ़ रहा है, वहीं दूसरी
ओर भारत में संस्कृत भाषा के विस्तार हेतु ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं
जिसके कारण भारत में ही संस्कृत का #विस्तार नहीं हो पा रहा है और संस्कृत
भाषा के महत्व से लोग #अज्ञात हैं ।
अब
केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों को सभी स्कूलों, कॉलेजों में संस्कृत भाषा
को अनिवार्य करना चाहिए जिससे बच्चों की बुद्धिशक्ति के विकास के साथ साथ
बच्चे सुसंस्कारी बने और सर्वागीण विकास हो ।
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