आखिर भारतीय मीडिया की विश्व रैंकिंग में ऐसी दुर्दशा क्यों ?

🚩ये कैसी #पत्रकारिता है ?

🚩#सुप्रीम_कोर्ट के पूर्व #न्यायाधीश #आर.वी. रवींद्रन की अध्यक्षता वाली #एनबीएसए यानि न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ने नियमों का उल्लंघन करने के लिए #एनडीटीवी के #हिंदी और #अंग्रेजी दोनों #न्यूज #चैनलों, #ईटीवी और #न्यूज_24पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है ।
Jago Hindustani – Which Type of Journalism is this ?
🚩अक्टूबर 2015 में, एनडीटीवी ने, बिना किसी साक्ष्य के, हिन्दू संगठनों को, पशु तस्करी के आरोप एक व्यक्ति की मौत का जिम्मेवार ठहराया था ! इस घटना को दादरी पार्ट-2 कहा गया था । #एनबीएसए के मुताबिक, दोनों न्यूज चैनलों ने तथ्यों के सत्यापन के बिना कुछ धार्मिक समूहों को हत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया था । इसलिए एनडीटीवी के हिंदी और अंग्रेजी दोनों न्यूज चैनलों को ऑन एयर माफी जारी करने को कहा है ।
🚩#एनबीएसए के अनुसार, एक घटना को ईटीवी बांग्ला के कवरेज में निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता का कमी थी । #ईटीवी #छत्तीसगढ़ ने ‘वैम्पायर्स’नामक एक कार्यक्रम में नियमों का उल्लंघन किया । इस कार्यक्रम में भूत-पिशाच और अंधविश्वास को बढ़ावा दिया गया था । #ईटीवी उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड को एक मॉल के निर्माण में बुलंदशहर विकास प्राधिकरण की ओर से अनियमितताओं के आरोपवाली एक न्यूज रिपोर्ट के लिए चेतावनी दी गई ।
🚩हिंदी न्यूज चैनल न्यूज 24 ने अपने एक कार्यक्रम में #राजनीतिक दल लोक जनशक्ति के पदाधिकारियों के खिलाफ लोगों को चूना लगाने का बेबुनियाद आरोप लगाया गया था ।
🚩#टाइम्स नाऊ चैनल को भी कुछ दिन पहले एनबीएसए ने पचास हजार रुपये का जुर्माना ठोंका था और कहा था कि जज मत बनो, गलती के लिए जुर्माना भरो और सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगो । टाइम्स नाऊ ने एक कथित आरोपी का साक्षात्कार दिखाते हुए उसे अपनी तरफ से दोषी करार दिया था । एनबीएसए ने कहा, ”प्रसारक किसी आरोपी को अपराध का दोषी नहीं बता सकते जब मामले की जाँच जारी हो या फिर अदालत को अब भी उसके दोष पर फैसला लेना बाकी हो । मीडिया की मंशा चाहे कितनी ही प्रामाणिक क्यों न हो, वह किसी अदालत या जाँच के समक्ष लंबित किसी मामले में #जज, #जूरी, #वकील या जाँचकर्ता की भूमिका नहीं अपना सकता । यह बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि मीडिया के लगातार प्रचार के चलते एक बार किसी व्यक्ति की इज्ज़त चली गई तो वह दोबारा वापस नहीं आ सकती ।”
🚩#भारतीय_मीडिया 273 न्यूज चैनलों और 82000 अखबारों के साथ तकरीबन 70-80 हजार करोड़ का उद्योग है। लेकिन विश्व रैंकिंग में इसका स्थान 130 के ऊपर (अफगानिस्तान से भी बदतर) है तो सवाल उठता है कि उसकी ऐसी दुर्दशा क्यों है?
🚩हिन्दी के वरिष्ठ कवि एवं पत्रकार विमल कुमार कहते हैं – “खबरों में हमें तटस्थ होना चाहिए । किसी भी मुल्क में मीडिया ने इतना पक्षपात नहीं किया जितना भारतीय मीडिया कर रहा है । दरअसल 80 प्रतिशत पत्रकारों के पास दृष्टि नहीं है । संपादक भी दृष्टिहीन हैं । हमें निष्पक्षता बरक़रार रखनी चाहिए ।”
🚩पत्रकारिता को किसी भी राष्ट्र या समाज का आईना माना गया है, जो उसकी समसामयिक परिस्थिति का निष्पक्ष विश्लेषण करता है परंतु वर्तमान में ऐसा नहीं हो रहा है । ऐसा सच्चे व ईमानदार पत्रकार भी जानते हैं । वर्तमान में पत्रकारिता ब्लैकमेलिंग, अश्लीलता, भ्रष्टाचार फैलाने का माध्यम बनता जा रहा है ।
🚩देश आज द्वेष, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है लेकिन इससे निपटने के लिये आमजनों को क्या करना चाहिए, सरकार की क्या भूमिका हो सकती है, सहित कई मुद्दों पर मीडिया आज मौन हो जाता है । लेकिन वहीं दूसरी ओर आतंकी गतिविधियों से लेकर नक्सली क्रूरता को लाइव दिखाने में भी यह मीडिया कभी पीछे नहीं रहता है, यहाँ तक की आज सर्वप्रथम किसी खबर को दिखाने की होड़ में मीडिया के समक्ष आतंकी व नक्सली हमला के तुरंत बाद ही हमला करने वाले कमाण्डर व अन्य आरोपियों के फोन व #ई-मेल तक आ जाते हैं । न्यूज चैनलों से लेकर अखबारों में आतंकियों व नक्सलियों के इण्टरव्यू मुख कवरेज बन जाते हैं। लेकिन गौर करनेवाली बात यह है कि बार-बार व प्रतिदिन इस समाचार को दिखाने व छापने से फायदा किसका होता है, आमजनता का, पुलिस का, नक्सली व आतंकी का या फिर मीडिया घरानों का । निश्चित रूप से इसका फायदा मीडिया व इन देशद्रोही तत्वों आतंकी व नक्सली को होता है, जिन्हें बिना किसी कारण से बढ़ावा मिलता है, क्योंकि बार-बार इनको प्रदर्शित करने से आमजनों व बच्चों में संबंधित लोगों के खिलाफ खौफ उत्पन्न हो जाता है और ये असामाजिक तत्त्व चाहते भी यही हैं । असामाजिक तत्त्व के इरादे को सफल करना कौन-सी पत्रकारिता की सूची में आता है?
🚩क्या इस तरह करना देशद्रोह नहीं है ? निर्दोष #संतों-महापुरुषों को दोषी बताकर जनता को गुमराह करना क्या निष्पक्षता पत्रकारिता की श्रेणी में आता है  ? जो आतंकी नहीं है उन्हें भगवा आतंकवाद के नाम से संबोधित करना क्या उचित है ? अफजल गुरु, याकूब मेमन आदि आतंकीवादी का समर्थन कर देश को तोड़ने की साजिश नहीं है ? ये कैसी #सेक्यूलर_पत्रकारिता है ? देश की सुरक्षा को दाँव लगाकर रिपोर्टिंग करना कौन सी देशभक्ति है ?क्या ऐसी पत्रकारिता पर केवल हजार या लाख रूपये का जुर्माना लगा देना ही पर्याप्त है ? वास्तव में इसके लिए जनमानस को ही आगे आना पड़ेगा । हमें भेद करना होगा देशद्रोही व देशभक्त के बीच । जागरुक जनता ही जागरुक समाज, राज्य व देश का निर्माण करता है ।  जो मीडिया देश, समाज व जनमानस के बारे में निस्वार्थ व निष्पक्षता से खबरों को पहुँचाता है, उन्हें ही जनमानस अपनाये तो यही उनकी देशभक्ति है । आप खुद को जाँचिये तो सही आप कहाँ है ?
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